फर्जी एनकाउंटर : एक ख़तरनाक प्रवृत्ति
आज जब हम मानव सभ्यता
के सबसे विकसित दौर से गुजर रहे है। हर क्षेत्र में खुद को परिपूर्ण मान रहे है, तो आखिर ऐसा क्यों हो रहा है कि हमारी
एक छोटी सी चूक के कारण
किसी को अपनी जान गंवानी पड़ रही है। 2009 में हुआ देहरादून फर्जी रणवीर एनकाउंटर
मामला एक बार फिर हमें ये सोचने को मजबूर कर रहा है। न्यायालय द्वारा इस मुठभेड़
को फर्जी करार दिया जाना और दोषी अफसरों पर कार्रवाई की बात से क्या इस समस्या का
हल हो पयेगा, बिल्कुल नहीं।
ऐसा नहीं है कि इस
मामलों में घिरे लोग शिक्षित नहीं है, उनके पास मानवीय संवेदनाए नहीं है। नहीं, ये सभी मुख्यधारा से जूड़े लोग है, ये सभी हमारे ही बीच से है, शिक्षित, होशियार हर सही गलत की समझ रखते है। फिर
ऐसा क्यों हो जाता है कि वो इस तरह की घटनाओं को अंजाम देने के लिए विवश हो जाते
है। ये अकेला मामला नहीं है, ऐसे कई मामले है। जो या तो वो समाचार पत्रों की सुर्खियाँ नहीं पाते
है या फिर कहीं किसी पन्ने के आखिर कॉलम में दबकर मर जाते है।
जब पुलिस न्याय
प्रक्रिया को नजरअंदाज कर कानून अपने हाथ में ले ले तो ऐसा पुलिस अधिकारी स्वयं
अपने को अपराधी के सांचे में ढ़ाल लेता है। जो पुलिस अधिकारी फर्जी मुठभेड़ में
अपराधियों या निदार्षों को मार गिराते हैं, उन्हें अपने अपराधी होने का एहसास हमेशा
बना रहता है और वे फिर कानून-व्यवस्था का पालन करने में जिस समर्पण के साथ काम
करना चाहिए, आगे वैसा नहीं कर पाते। उन्हें हर वक्त अपने बचाव की चिंता रहती है
और ऐसे में वे झूठी गवाहियां, झूठे साक्ष्य, बनावटी घटनास्थल, नकली सच सिद्घ करने में उलझ जाते है।
नेशनल ह्यूमन राईट
कमिशन (एनएचआरसी) की रिपॉर्ट का अगर जायजा लिया जाये तो ये एक गंभीर समस्या बनकर
हमारे सामने आता है। 2002 से 2013 तक 1788 फर्जी एनकाउंटर के मामले सामने आये है। लेकिन इनमें कितने मामलों ने
हमारा ध्यान खींचा। भले ही कुछ मामले हमारे सामने विमर्श के तौर आए। लेकिन वो पूरी
तरह से राजनीतिकरण की भेंट चढ़ गया। जब इस तरह का मामला सामने आता है तो कुछ ऐसा
माहौल बन जाता है कि कोई भी मामला क्यों न हो, छोटा या बड़ा, जरा सी गुंजाइश दिखते ही राजनैतिक दल
आरोप-प्रत्यारोप में उलझ पड़ते हैं और ऐसा करते ही मामला मुख्य मुद्दे से गौण हो
जाता हैं।
एनएचआरसी की रिपार्ट
के मुताबिक 2002 से 2013 तक सबसे ज्यादा फर्जी एनकाउंटर का मामला उत्तर प्रदेश में घटित हुआ।
यहां कुल 743 मामले सामने आए। इसके बाद असम (273), आंध्राप्रदेश (101), महाराष्ट्र (88), झारखण्ड (55), उत्तराखण्ड (53), दिल्ली (52), छत्तिसगढ़ (46), कर्नाटक (39), उडि़सा (39), मनीपुर (38), मेघालय (33) और तमिलनाडू (31) आदि राज्य है। जबकि फर्जी एनकाउंटर मामले
में सबसे निचले पायदान पर गुजरात है, जहां कुल 12 मामले सामने आए है। ये आंकड़े हमारी
पूरे सामाजिक व्यवस्था पर सवालियां निशान खड़ा करता है। आखिर ऐसा क्यों है कि
हमारी पूरी कानून व्यवस्था को धौसा बताकर कुछ लोग इस तरह के घटनाक्रम को अंजाम
देने के लिए विवश हो जाते है।
हमारी न्याय
प्रक्रिया भी इतनी धीमी और पेचीदा है कि जब इस तरह के मामले न्यायालय में पहुंचते
है तो अमूमन न्याय मिलने में सालों लग जाते है। मार्च, 1982 में गांेडा जिले के
माधोपुर गांव में हुआ ऐसा ही एक मामला में न्याय मिलने में करीब 31 वर्ष लग गए। जिसमें डीएसपी सहित 12 निर्दोष ग्रमिणों की जान चली गई थी।
न्यायालय ने इस मामले में दोषी पाये गए 3 पुलिसकर्मियों को फांसी और 6 को उम्र कैद की सजा सुनाई। अभी भी कई
फर्जी एनकाउंटर के मामले न्यायालय के फाईलों में दबे पड़े है। आज हम इस दहलीज पर
खड़े हैं कि इन सारे मुद्दों फिर से विश्लेषण करने की जरूरत है, नहीं तो सभ्य समाज में मानवीय मापदण्ड
नगण्य हो जायेंगा।
