Wednesday, September 9, 2015

कलबुर्गी की हत्या तार्किकता का गला घोंटने का प्रयास

राम पुनियानी
गत 30 अगस्त 2015 को प्रोफेसर मलीशप्पा माधीवलप्पा कलबुर्गी की हत्या से देश के उन सभी लोगों को गहरा सदमा पहुंचा है जो उदारवादी समाज के हामी हैं, तार्किकता के मूल्यों का आदर करते हैं और अंधश्रद्धा के खिलाफ हैं। प्रोफेसर कलबुर्गी, जानेमाने विद्वान थे और उन्होंने 100 से भी अधिक पुस्तकें लिखीं थीं। वे 12वीं सदी के कन्नड़ संत कवि बस्वना की विचारधारा को जनता के सामने लाए। वे मानते थे कि लिंगायत - जो कि बस्वना के अनुयायी हैं - को धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा मिलना चाहिए क्योंकि वे वैदिक परंपरा का हिस्सा नहीं हैं। बस्वना के छंदों में निहित शिक्षाओं, जिन्हें ‘‘वचना’’ कहा जाता है, का उन्होंने गहराई से अध्ययन किया था और इसने उनकी तार्किकतावादी सोच को गढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। 

कलबुर्गी द्वारा बस्वना की शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार और मूर्तिपूजा व ब्राह्मणवादी धार्मिक अनुष्ठानों की उनकी खिलाफत ने बजरंग दल जैसे हिंदुत्ववादी संगठनों को उनका शत्रु बना दिया। तथ्य यह है कि पुरातनकाल से नास्तिकतावादी परंपरा, हिंदू धर्म का हिस्सा रही है। इस परंपरा के एक प्राचीन उपासक थे चार्वाक। मूर्तिपूजा का विरोध भी हिंदू धर्म के लिए कोई नई बात नहीं है। आर्यसमाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती ने मूर्तिपूजा न करने का आह्वान किया था। 

कलबुर्गी की हत्या से कुछ समय पहले, पड़ोसी बांग्लादेश में तीन धर्मनिरपेक्ष युवा ब्लॉगर्स की हत्या कर दी गई थी। सीरिया में इस्लामिक स्टेट के कट्टरवादियों ने खालिद अल-असद नामक अध्येता को जान से मार दिया था। महाराष्ट्र में लगभग दो वर्ष पहले, प्रसिद्ध तार्किकतावादी डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की हत्या ने पूरे देश में हलचल पैदा कर दी थी। उनके प्रयासों से ही महाराष्ट्र में काला जादू और अंधश्रद्धा विरोधी कानून लागू हुआ था। एक अन्य सम्मानित कार्यकर्ता कामरेड गोविंद पंसारे को लगभग एक वर्ष पहले मौत के घाट उतार दिया गया था। पंसारे जिन कई क्षेत्रों में सक्रिय थे, अंधश्रद्धा का विरोध उनमें से एक था। महाराष्ट्र में अत्यंत सम्मान से देखे जाने वाले शासक शिवाजी पर उन्होंने एक पुस्तक लिखी थी जो खासी लोकप्रिय हुई थी। पंसारे अपनी पुस्तक में बताते हैं कि शिवाजी किसानों के हितैषी थे व सभी धर्मों का सम्मान करते थे। शिवाजी के चरित्र का यह प्रस्तुतिकरण, हिंदुत्ववादियों को रास नहीं आया। 

डॉ. कलबुर्गी की हत्या, धारवाड़ में उनके घर पर हुई। प्रोफेसर कलबुर्गी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वे हंपी स्थित कन्नड़ विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति थे। वे राष्ट्रीय और कर्नाटक साहित्य अकादमी पुरस्कारों के विजेता थे। इस विद्वान प्राध्यापक ने वीरशैव व बस्वना परंपरा का विशद अध्ययन किया था। विवादों ने उनका कभी पीछा नहीं छोड़ा और ना ही कट्टरपंथियों की धमकियों ने। वीरशैव व बस्वना सहित कन्नड़ लोकपरंपरा पर आधारित आलेखों का उनका संग्रह ‘मार्ग’ सबसे पहले विवादों के घेरे में आया। उन्हें कई बार जान से मारने की धमकियाँ मिलीं। उन्हें पुलिस सुरक्षा प्रदान की गयी, जिसे उनके ही अनुरोध पर कुछ समय पहले वापस ले लिया गया। उन्होंने मूर्तिपूजा बंद करने के मुद्दे पर यूआर अनंथमूर्ति का समर्थन किया था। उनके द्वारा विहिप नेताओं और विश्वेश्वरतीर्थ स्वामी को सार्वजनिक बहस के लिए निमंत्रित करने से एक नए विवाद का जन्म हुआ। कर्नाटक सरकार के अन्धविश्वास विरोधी विधेयक का समर्थन करने के कारण उन्हें बजरंग दल जैसे संगठनों के कोप का शिकार बनना पड़ा। उनका जमकर विरोध हुआ और कई स्थानों पर उनके पुतले जलाये गए। 

दाभोलकर, पंसारे और कलबुर्गी की हत्याओं में कई समानताएं हैं। यद्यपि वे अलग-अलग क्षेत्रों में सक्रिय थे तथापि तीनों तार्किकतावादी थे, अपनी बात बिना किसी लाग-लपेट के कहते थे और उन्हें लगातार धमकियाँ मिलती रहती थीं। उनके हत्या के तरीके में भी कई साम्य हैं। तीनों की हत्या अलसुबह हुईं, हत्यारे मोटरसाइकिल सवार थे, जिनमें से एक बाइक चला रहा था और दूसरे ने ताबड़तोड़ ढंग से गोलियां चलाईं और फिर दोनों भाग निकले। यह भी क्या अजीब नहीं है कि इतना समय बीत जाने के बाद भी, दाभोलकर और पंसारे के हत्यारे पुलिस की पहुँच से दूर हैं।

कलबुर्गी की हत्या के बाद, बजरंग दल के एक कार्यकर्ता भुविथ शेट्टी ने ट्वीट किया, “पहले यूआर अनंथमूर्ति और अब एमएम कलबुर्गी। हिन्दू धर्म का मजाक उड़ाओ और कुत्ते की मौत मरो। और प्रिय केएस भगवान, अब तुम्हारी बारी है”। इस ट्वीट को बाद में वापस ले लिया गया। इसके बाद, हिन्दू दक्षिणपंथी संगठनों से जुड़े कई लोगों ने यह कहना शुरू कर दिया कि कलबुर्गी द्वारा हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान किये जाने से उनके प्रति हिन्दुओं के मन में रोष था और इसलिए उनकी हत्या हुई। यह एक तरह से उस असहिष्णुता को औचित्यपूर्ण ठहराने का प्रयास है, जो हमारे समाज में जड़ें जमाती जा रही है। इस मामले में सभी धर्मों के कट्टरपंथियों की सोच एक-सी है। सलमान रूश्दी को धमकियाँ दीं गयीं थीं और तस्लीमा नसरीन संकुचित सोच वालों के निशाने पर थीं। बांग्लादेश में ब्लॉगरों की हत्या हुई तो पाकिस्तान में सलमान तासीर को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। तासीर का कसूर यह था कि वे ईशनिंदा की आरोपी एक ईसाई महिला का बचाव कर रहे थे।

तार्किकता का विरोध, मानव इतिहास का अंग रहा है। चार्वाक ने हमारी दुनिया के प्रति ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण और विशेषकर वेदों को दैवीय बताए जाने पर प्रश्न उठाए। चार्वाक का कहना था कि वेदों को मनुष्यों ने लिखा है और वे सामाजिक ग्रंथ हैं। इस कारण चार्वाक को प्रताडि़त किया गया। समय के साथ, पुरोहित वर्ग द्वारा अपने विचारों को समाज पर लादने की प्रक्रिया ने संस्थागत स्वरूप ग्रहण कर लिया। गौतमबुद्ध, जो अनीश्वरवादी थे और मनुष्यों की समस्याओं का हल इसी दुनिया में खोजने के हामी थे, की शिक्षाओं का जबरदस्त विरोध हुआ। मध्यकालीन भक्ति संत तार्किक सोच के हामी थे और धर्म के नाम पर प्रचलित सामाजिक रीति-रिवाजों और पाखंडों के विरोधी। महाराष्ट्र के तुकाराम जैसे कई संतों को पुरोहित वर्ग के हाथों प्रताड़ना सहनी पड़ी। 

दुनिया के अन्य हिस्सों में भी ऐसा ही हुआ। यूरोप में कई वैज्ञानिकों को चर्च के कोप का शिकार बनना पड़ा। जब गैलिलियों ने यह कहा कि धरती गोल है तो चर्च ने उन्हें नरक में जाने का श्राप दिया। इसी तरह की प्रताड़ना, कष्ट और सज़ाएं कई वैज्ञानिकों को भोगनी पड़ीं। चर्च अपनी ‘‘दैवीय सत्ता’’ का इस्तेमाल, सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को रोकने और वैज्ञानिक सोच को बाधित करने के लिए करता रहा। शनैः शनैः तार्किक सोच के विरोधी कमज़ोर पड़ते गए। पुरोहित वर्ग का तर्क यह रहता है कि वे सारे ज्ञान का भंडार हैं क्योंकि हमारे ‘‘पवित्र ग्रंथों’’ में सारा ज्ञान समाहित है। इस सोच का विभिन्न संस्कृतियों और धर्मों में अलग-अलग ढंग से प्रकटीकरण हुआ है। पाकिस्तान में कुछ मौलानाओं ने यह दावा किया कि देश में बिजली की कमी को जिन्नात की मदद से दूर किया जा सकता है क्योंकि जिन्नात असीमित ऊर्जा के स्त्रोत हैं। उन्होंने अपने इस दावे का आधार धर्म को बताया।

भारत में स्वाधीनता संग्राम के दौरान, सामाजिक परिवर्तन के हामियों ने तार्किक सोच को बढ़ावा दिया और धार्मिक ग्रंथों को तार्किकता की कसौटी पर कसना शुरू किया। परपंरावादी, जो पुरातन सामाजिक समीकरणों को बनाए रखना चाहते थे, ने ‘‘ज्ञान की हमारी महान प्राचीन विरासत’’ का राग अलापना शुरू कर दिया। आस्था पर आधारित सोच और वैज्ञानिक पड़ताल एक-दूसरे के सामने आ गए। स्वतंत्रता के बाद, मुख्यतः पंडित जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्री होने के कारण, वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा मिला और उच्च शिक्षा व शोध के कई संस्थान स्थापित हुए। इससे देश न केवल आर्थिक दृष्टि से आगे बढ़ा वरन् उसके चरित्र का भी प्रजातांत्रिकरण हुआ। यह वह युग था जब देशवासी भारत के समग्र विकास की कल्पना को साकार करने में जुटे हुए थे और तार्किक सोच को प्रोत्साहित करना, इस प्रक्रिया का आवश्यक अंग था। सन् 1958 में संसद ने राष्ट्रीय वैज्ञानिक नीति संकल्प पारित किया। 

सन 1980 के दशक के बाद से स्थितियां बदलने लगीं। धर्म के नाम पर राजनीति का उभार हुआ। सामाजिक उद्विग्नता को कम करने के लिए आस्था के भावनात्मक सहारे का इस्तेमाल होने लगा। कुछ राजनैतिक ताकतों ने धार्मिक पहचान और आस्था पर राजनीति करनी शुरू कर दी। जैसे-जैसे सामाजिक रूढि़वाद बढ़ा, तार्किक सोच का विरोध भी बढ़ने लगा। लगभग इसी समय ऐसे समूह व संगठन भी उभरे जो तार्किक व वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देना चाहते थे और अंधश्रद्धा के विरोधी थे। इनमें से सबसे महत्वपूर्ण था केरल शास्त्र साहित्य परिषद। बाद में, महाराष्ट्र में नरेंद्र दाभोलकर ने अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति का गठन किया। 

अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के कार्यकर्ता, गांव-गांव जाकर यह प्रदर्शित करने लगे कि किस प्रकार बाबाओं और तथाकथित साधुओं द्वारा दिखाए जाने वाले ‘‘चमत्कार’’ केवल हाथ की सफाई हैं। और यह भी कि ये बाबा, गरीब ग्रामीणों के असुरक्षा के भाव का लाभ उठाकर उनका शोषण करते हैं। अंधश्रद्धा का विरोध करने के अतिरिक्त, पंसारे ने शिवाजी का एक ऐसे शासक के रूप में चित्रण करना शुरू किया जो कि सभी धर्मों का समान रूप से आदर करता था। दक्षिणपंथी इस प्रचार को पचा नहीं पा रहे थे परंतु उनके पास दाभोलकर के धारदार तर्कों का कोई जवाब भी नहीं था। कर्नाटक में यूआर अनंथमूर्ति ने मूर्तिपूजा और अंधश्रद्धा के खिलाफ अभियान शुरू कर दिया। कलबुर्गी ने न केवल अनंथमूर्ति का समर्थन किया वरन उन्होंने अंधश्रद्धा को बढ़ावा देने वाली गतिविधियों को प्रतिबंधित करने संबंधी विधेयक का समर्थन भी किया। उन्होंने अपने विचारों का प्रचार करने के लिए कई पुस्तकें और पेम्फलेट लिखे।

इसके कुछ समय पहले, पहली एनडीए सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने पौरोहित्य व ज्योतिषशास्त्र के पाठ्यक्रम विश्वविद्यालयों में लागू किए। इससे उन तत्वों को बढ़ावा मिला जो हिंदू धर्म की राजनीति करने वाली ताकतों के साथ थे और ‘‘आस्था’’ के नाम पर आमजनों को बेवकूफ बनाने में लगे हुए थे। सन् 2014 में भाजपा सरकार के दिल्ली में शासन में आने के बाद से पौराणिकता को इतिहास के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। प्राचीन भारत में हवाई जहाज हुआ करते थे और प्लास्टिक सर्जरी की जाती थी, इस तरह के बेसिरपैर के दावे किए जा रहे हैं। इस सरकार के सत्ता में आने से हिंदुत्ववादी राजनीति का अतिवादी तबका बहुत उत्साहित है व काफी आक्रामक हो गया है। समाज में उदारवादी सोच के लिए स्थान कम होता जा रहा है और बहस का स्थान हिंसा ने ले लिया है। असहमत होने के अधिकार को तिलांजलि देने की कोशिश हो रही है और जो आपसे असहमत है, उसे बल प्रयोग और डराधमका कर चुप करने की प्रवृत्ति में बढ़ोत्तरी हुई है। दाभोलकर, पंसारे व कलबुर्गी जैसे साधु प्रवृत्ति के विद्वानों की हत्या यह बताती है कि हमारे देश में प्रतिगामी व कट्टरपंथी तत्वों का बोलबाला बढ़ रहा है। ये तत्व तार्किक सोच को समूल उखाड़ फेंकना चाहते हैं।

हिंदुत्ववादी दक्षिणपंथियों द्वारा अत्यंत आक्रामकता से उन लोगों का विरोध किया जा रहा है जो तार्किक सोच के पैरोकार हैं और जातिप्रथा व मूर्तिपूजा के विरोधी हैं। ये तत्व, हिंदू दक्षिणपंथी राजनीति को मज़बूती दे रहे हैं। हालिया वर्षों में राममंदिर व गौहत्या जैसे पहचान से जुड़े मुद्दों को सीढ़ी बनाकर यह राजनीति सत्ता तक पहुंची है। यह राजनीति ब्राह्मणवादी हिंदू धर्म, जो कि जातिगत पदक्रम को औचित्यपूर्ण ठहराता है, पर आधारित है। दाभोलकर, पंसारे व कलबुर्गी जैसे व्यक्तियों की विचारधारा, हिंदुत्ववादी राजनीति की जड़ों पर प्रहार करती है। हिंदुत्ववादी, धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बना रहे हैं। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि हिंदू धर्म में ही अनेक विविध और परस्पर विरोधाभासी विचारधाराएं मान्यताएं सदियों से विद्यमान रही हैं। कलबुर्गी की हत्या, यथास्थितिवादियों और परिवर्तनकामियों के बीच चल रहे संघर्ष का प्रतीक है। 

यह सुखद है कि इन नृशंस हत्याओं का जबरदस्त विरोध हो रहा है। विविधता और तार्किकता के समर्थक समूह सोशल मीडिया में इनका विरोध कर रहे हैं और इनके पीछे की विचारधारा का पर्दाफाश कर रहे हैं। इससे यह साफ है कि अभी भी देश में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जो तार्किकतवादी मूल्यों में आस्था रखते हैं और यही हम सबके लिए आशा की किरण है। दाभोलकर की हत्या के बाद से कई ऐसे संगठन एक मंच पर आए हैं। वे असहिष्णु, परंपरावादी, आक्रामक दक्षिणपंथी राजनीति का विरोध करने के प्रति दृढ़संकल्पित हैं और सामाजिक परिवर्तन के इन पैरोकारों के अधूरे कार्य को पूरा करने के प्रति प्रतिबद्ध हैं।
 नोट- राम पुनियानी के फेसबुक पेज से साभार 

Sunday, September 6, 2015

शिबा असलम फहमी भारत की उन चुनिंदा मुस्लिम महिला बुद्धिजीवियों में से एक हैं जो अपनी बेबाक लेखनी और भाषा के द्वारा मुस्लिम समुदाय से जुड़ी विषयों पर हमेशा लिखती- बोलती रहती हैं. जो पेशे से पत्रकार, समाजसेवी और मुस्लिम नारीवादी लेखिका हैं. उनसे मुस्लिम समुदाय, बाज़ार  और मीडिया विषय पर जीशान की बातचीत-

सवाल-  बाज़ार ने हर तबके को अपने चपेट में लिया है ऐसे में आप मुस्लिम समुदाय को कैसे देखती हैं?
जवाब-  मेरे हिसाब से भारत का समुदाय और मुस्लिम समुदाय बाजारवाद के हमलों से बंटा हुआ नहीं हैं यह बिलकुल उसी तरह का समुदाय है जिसकी क्रय क्षमता के अनुसार बाज़ार दूसरे समुदाय को प्रभावित करते हैं. मुस्लिम समुदाय को इन बाज़ार के हवाले से अलग कर के देख पाना मुझे लगता है कि गैर जरूरी है क्योंकि बाज़ार हमें मुख्य तौर पर क्या देता हैं वह है तकनीक. मुसलमानों के किचन बदल गए हैं मुसलमान युवाओं के कपड़े बदल गए हैं और रोजमर्रा के जीवन में जो उत्पाद इस्तेमाल किये जा रहे है इसका निर्धारण अब बाज़ार कर रहा है उसी तरह जैसे किसी अन्य समुदाय के जीवन में. इसके अलावा बाज़ार ने हमारे स्वास्थ्य में, शिक्षा में जो परिवर्तन लाये है हमारी आकांक्षाये, इच्छाये वहीं है तो बाज़ार को आप अच्छा माने या बुरा लेकिन यह लोगों को सेक्युलर बनाये रखता है और यह वैचारिक रूप से आपको प्रभावित करने में फर्क नहीं करता. लेकिन कुछ चीजे ऐसी है जो मीडिया से सम्बंधित है वह थोड़ी सी अलग है. खासकर पॉपुलर मीडिया से, जिसे हम मनोरंजन उद्योग कहते है. मनोरंजन उद्योग ने बाज़ार के साथ मिलकर एक खास प्रकार का हिन्दू वर्चस्ववादी सोच को विकसित करना शुरू किया है. जितने भी टीवी सीरियल है, जितने भी टीवी कार्यक्रम है उनमें भगवान की पूजा अर्चना, व्रत, हवन और इसी प्रकार के क्रमकांडों को करते हुए दिखाया जाता है, यहीं नहीं कौन बनेगा करोड़पति जैसा क्विज बेस्ड जानकारियों भरा कार्यक्रम में भी  फास्टर फिंगर फस्ट से लेकर आगे पूछे जाने वाले सवाल हिंदू धर्म से जुड़े होते हैं. हिंदू देवी देवताओं के मान्यताओं के आधार पर सवाल किये जाते है. जबकि भारत में दूसरे धर्म भी हैं. भारत में जैन धर्म है, बौद्ध धर्म है, सिख धर्म है, पारसी धर्म है, ईसाई धर्म भी है. लेकिन इन सबके हवाले से कोई सवाल कभी नहीं उठता. अगर कौन बानेगा करोड़पति जैसा प्रोग्राम जो हमें लगता है सेक्युलर सा प्रोग्राम है, जानकारी आधारित प्रोग्राम है अगर इसमें इतने बारिकी से एक खास संस्कृति और धर्म और उनके परम्पराओं को बढ़ा रहा है और इसे हमारे मुख्य धारा का हिस्सा बनाया जा रहा है. भारत से संदर्भ में इसे एकल संस्कृति कारन के रूप में देख या  जा रहा है जो बाज़ार और मीडिया के जरिये फैलाई जा रही है.
सवाललेकिन जब हम वैचारिक रूप से इतर इसे एक प्रोडक्टिविटी के तौर पर देखते है तो ये पश्चिमी वर्चस्व आधारित दिखता है, ऐसा क्यों?
जवाब-   पश्चिमीकरण की जब हम बात करते हैं तो वेश-भूषा में बदलाव की बात की जाती है लेकिन ऐसा नहीं है. इस तरह के कपड़े हम पहले भी पहनते थे. जब इस तरह का मीडिया का हमारे जिंदगी में प्रभाव नहीं था. 24 घंटे के चैनल इन्वेंट नहीं हुए थे. देखिये बहुत बड़ा फर्क पड़ा है जब से 24 घंटे का न्यूज़ चैनल या टीवी चैनल हमारे जिंदगी में आये हैं. पहले जब दूरदर्शन शाम को कुछ घंटे के लिए प्रसारित होता था और आज का जो टीवी है जो 24 घंटे का है जो एक ऐसा राक्षस है जिसका पेट कभी भरता ही नहीं. इसे हर समय कुछ न कुछ दिखाना होता है. ये वाला जो समय है जिसके हमारे जिंदगी में आने के लगभग 25 साल हुए है इससे हम बिलकुल ग्लोबलाइज्ड हुए है.
सवाल –  सामुदायिक संस्कृति के ह्रास में मीडिया को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है क्या आप इस बात से सहमत है?
जवाब-   आप सामुदायिक सांस्कृतिक से क्या समझते है कम्युनिटी लाइफ, कम्युनिटी कल्चर
हां बिलकुल,
लेकिन मुझे नहीं लगता है. एक तो यह कम्युनिटी कल्चर एक बड़ी अच्छी चीज है जिसे हर हाल में बचाना चाहिए मुझे तो इस बात से ही एतराज है. कम्युनिटी कल्चर जो हमारे गांवों में है वह दलितों और महिलाओं के उत्पीड़न का कल्चर है हम उसे कैसे बचाने की बात कर सकते है बहरहाल, हमें उनमें बदलाव चाहिए. शहरों में जो घेटोराइजेशन है माइनॉरिटीज का वह कम्युनिटी कल्चर का हिस्सा बन चुका है हमें उससे बचना चाहिये. हमें उसे तोड़ना चाहिये. कम्युनिटी कल्चर कौन-सा हमें बचाना है और कौन-सा हमें छोड़ना है इसके प्रति हमें जागरूक होना चाहिये. दूसरी बात यह है कि आज कम्युनिटी कल्चर बढ़ा भी है. आज जिस तरह के महंगे-महंगे कार्यक्रम होते है सत्संग होते है, जागरण होते हैं शहरों से लेकर कस्बों तक. इससे एक दूसरे तरह का कम्युनिटी कल्चर बढ़ा भी है. आज एक खास बाबाओं के इर्द-गिर्द जो कम्युनिटी विकसित हुयी है जो उनको अपना बाबा या फिर अपना संत मानते है तो ये आप के समुदाय बन जाते है.
सवाल-    लेकिन जब मुस्लिम कम्युनिटी के संदर्भ में बात करते है तो यह सारी चीज नगण्य हो जाती है.
जवाब-   हां, बिलकुल ठीक है लेकिन इस्तेमे, सिरातुन नबी कम्युनिटी, कुछ जमियत, कुछ मुशावारातें है. देखिये किसी भी समाज में कम्युनिटी लाइफ का फ़ॉर्मेशन होना लाजमी बात है और यह होता है. यह मुसलमानों में भी है लेकिन इनमें उतनी अग्रेसिवली नहीं हो रहा है और वह महदूद है धर्म के इर्द-गिर्द. पुराने ज़माने में हमारे घरों में मिलाद होते थे वो आज कम हो गए है, सिरातुन नबी के जलसे आम होते जा रहे है तो यह फर्क तो है.
सवाल-   मुस्लिम महिलाओं में भी परिवर्तन देखे जा रहे है. फैमिली वैल्यूज की कमी में क्या इनकी कोई भागीदारी दिखती है?
जवाब-   मुझे लगता है जिसको आजकल हमलोग फैमिली वैल्यूज के कमी कमी के तौर पर देखते हैं या महिलाओं में टीवी सीरियल्स, मनोरंजन के लिए समय बंध गए हैं ऐसा क्यों न हो? पुरुष अपने लिए अपनी शराब, अपनी महफ़िल, अपनी अड्डेबाजी, अपने चाय की दुकान के लिए हमेशा से समय निकलता है. अगर वो कोई ख़राब बात नहीं थी तो घर में बैठकर टीवी देखना कैसे ख़राब बात है. और अपने मनोरंजन के लिए समय तय कर देना या इस तरह से काम निपटाना कि जब उनके पसंद का सीरियल आये वह फ्री हो जाये तो यह कौन-सी ख़राब बात है. अगर मुस्लिम महिलाओं ने भी जीने की अभिलाषा, जिज्ञासा और जागरूकता बढ़ायी है तो इसमें गलत बात क्या है. इसपर सवाल उठाना मुझे लगता है मर्दवादी दृष्टिकोण है. हां, लेकिन इनमें गुणवत्ता की बात जरुर होनी चाहिये. जब वह अपने लिये समय निकाल रही है तो उस समय में क्या देख रही है उस समय में वह वहीं देख रही है जो कोई और अन्य महिला देख रही है भारत की. तो एक समुदाय के आधार पर ये तय करना पड़ेगा क्या स्वीकार करना है और क्या नहीं? और यह सिर्फ मुसलमान समुदाय नहीं तय कर सकता है. वह सिर्फ हिंदू समुदाय भी तय नहीं कर सकता. इसके लिए देश व्यापक बहस होनी चाहिए, एक सामाजिक मंथन होना चाहिये.
सवाल-    वैश्विक बाज़ार एक वैश्विक समाज का निर्माण कर रहा है, आपकी क्या राय है?
जवाब-     एक मुस्लिम महिला के तौर पर मुझे लगता है आज मैं जितनी बेहतर स्थिति में थी उतनी बेहतर स्थिति में पहले कभी नहीं थी. तमाम बुराइयों के बावजूद एक महिला के तौर पर आज मुझे बहुत से चॉइस मिली है. चुनने का अधिकार मिला है, मुझे रिप्रोडक्टिव हेल्थ चुनने का अधिकार मिला है जिसमें बहुत हद टेक्नोलॉजी का अहम् योगदान है इसलिए आज हम टेक्नोलॉजी को कोस नहीं सकते. टेक्नोलॉजी से दुनिया करीब आयी है, आज ग्लोबलाइजेशन से यह फर्क आयी है कि अमेरिका का मज़दूर, चाइना का मज़दूर और भारत का मज़दूर आज एक होकर बात कर सकता है. सीरिया में जो हो रहा है, उसमे सऊदी अरब और इजराइल का जो रोल है हम उस पर सम्मिलित रूप से बात कर सकते हैं. हमें ये ग्लोबलाइजेशन से ही मिला है. हमें ये वही मीडिया से ही मिला है तो आप मीडिया को किस तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं इसके लिए आप अगर जागरूक होकर मंथन नहीं करेंगे तो आप इस भावना का शिकार होंगे की आज महिला समय का गलत इस्तेमाल कर रही हैं. लेकिन हमारे बच्चे, हमारे युवा, हमारे पुरुष भी कौन सा अच्छा काम रहे है वह डीजे कल्चर में, वह हनी सिंह कल्चर में, वह पोपुलर कल्चर में फंसे हुए हैं. हमें यह याद रखना चाहिये वेस्ट हमें अपना पीछ लग्गू बनाये रखने के लिए कौन-कौन सा आइटम्स देता है.
सवाल-     मीडिया द्वारा प्रस्तुत किये जा रहे मानसिक कचड़े जो बहुतयात मात्रा में पश्चिम से आयतित है,  क्या यह फैमिली वैल्यूज के ह्रास का कारक है?
जवाब-      वेस्ट या अमेरिका जिस वजह से आज दुनिया पर राज कर रहा है. जो उसके सबसे बड़े टेक्नोलॉजी है जो उनके सबसे बड़े दिमाग हैं, जो सबसे बड़े साइंटिस्ट है, जो सबसे बड़े एक्सपर्ट है उनके बारे में वह जानकारियां नहीं देता है. वह किस स्तर पर है हम सिर्फ परिकल्पना कर सकते हैं कि वह कितना आगे निकल चूका है. उन्हें तो वह अपने राज और गुनाहों की तरह हम से छुपा कर रखे हुए है. वह हमें देता क्या है वह हमें ग्रैमी अवार्ड या ऑस्कर अवार्ड का चकाचौंध भरा कार्यक्रम पूरे दुनिया को देता है. वह हमें पॉपुलर म्यूजिक से जुड़े हुए कभी रैप म्यूजिक, कभी बीटल्स देता है. हमारे पास जो उनके फ़िल्में आती हैं जिसमें वह एलियन से लड़ते हैं किसी विशालकाय जीव से लड़ते हैं जैसे कि उनकी संस्कृति में सामाजिक समस्याएं सारी ख़त्म हो गयी हैं. अब उनके लिए एलियन से लड़ना या बहुत बड़े कीड़े-मकौड़े से लड़ना का ही कार्यक्रम बचा है जैसे उनके समाज की वह सारी समस्या हल कर चुके हैं हमें वह यह एजेंडा देते हैं अपने को परफेक्ट बताते हुए. वह मनोरंजन इंडस्ट्री के हवाले से तय करते हैं कि हमारा युवा उनसे किस प्रकार प्रभावित होगा. उनके वैज्ञानिक, बड़े दिमाग क्या कर रहे हैं, अगला उनका टारगेट क्या है. वह तो अपने चीजे ऐसे छुपा कर रखते हैं जैसे अपना गुनाह. तो ऐसे में हमें यह पता ही नहीं वह जो दुनिया पर शाषण कर रहे हैं उसका आधार क्या है.
सवाल-    तो ऐसे में क्या भारत मुस्लिम लीडरशिप की कमी महसूस होती है?
जवाब-    लीडरशिप का तो बोहरान है. मुसलमानों के जो सियासी लीडर हैं वह इस आधार पर काम कर रहे हैं और हमें यह एजेंडा देते हैं कि कितने पॉलिटिशियन, कितने एमपी, एमएलए विधानसभा और पार्लियामेंट में पहुँच रहे हैं और कितने मुसलमान सुर्फाओं को लाल बत्तियां मिली हैं. लेकिन वह यह नहीं देखते की मुसलमान अवाम के लिये पॉलिसीज क्या आ रही हैं. आज पार्लियामेंट में कितना कम मुसलमान रह गया है इसका बड़ा शोर है लेकिन जब वहां सबसे ज्यादा मुसलमान सदस्य थे तो वह मुसलमानों की शिक्षा, मुसलमानों की स्वास्थ्य, मुसलमानों की रोजगार को बढ़ाने की पालिसी साजी में कितना कारक बन पाये, कितना उसको प्रभावित कर पाये. इसका आंकलन हमारे पास नहीं हैं. हमें इस भ्रम से बचना चाहिये कि कुछ मुसलमानों को निजी तौर पर लाल बत्तियां मिल जाये, वह किसी कमेटी के चेयरमैन बन जाये, किसी कमीशन के चेयरमैन बन जाये या वह मंत्री बन जाये इससे मुसलमानों को कोई फर्क नहीं पड़ता है. इससे उस परिवार को फर्क पड़ता है जिस परिवार को लाल बत्ती मिलती है. यह तो सियासी लीडरशिप की बात हुई लेकिन धार्मिक लीडरशिप है असली गड़बड़ी हुई है. धार्मिक लीडरशिप ने लोगों को बहुत कामयाब जिंदगी बशर करने के लायक नहीं बनाया. उन्होंने आखरत की इतनी फिक्र हम पर लाद दी है और कल्चर बचाने की इतनी फिक्र हमारे अंदर थोप दी है कि हमारे युवा न अच्छे डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, चार्टेड अकाउंटेड और न अच्छे टीचर बन पाए. मुसलमानों का कॉन्ट्रिब्यूशन क्या है कुछ भी नहीं है.
सवाल-    अभी हाल ही में देवबंद वालों ने मदरसों को मिलने वाली सेंटर ग्रांट को लेने से इंकार कर दिया है. इस पर आप की क्या राय है?
जवाब-   मुझे नहीं पता इसके पीछे असली मंशा क्या है. हो सकता है वह यह चाहते हो कि सरकार का किसी भी प्रकार का हमारे ऊपर शिकंजा न हो, सरकार किसी भी तरह से हमें मॉनिटर न करें. अगर यह बात है तो मुझे यह बात अच्छी नहीं लगती है क्योंकि हम जितने ट्रांसपेरेंट होकर काम करेंगे वह बेहतर होगा. और हमारा हर तरह का सोशल ऑडिट हो, अकादमिक ऑडिट हो, फाइनेंसियल ऑडिट हो इससे संस्थान और अच्छे बनते हैं, उनकी नींव और भी मज़बूत होती है. उनमें पारदर्शिता आती है. दूसरी बात यह भी कि भारतीय मुसलमान सब्सिडी के खिलाफ भी कह रहा है हज सब्सिडी के खिलाफ है, मदरसे वाले भी कह रहे है कि हमें ग्रांट नहीं चाहिये. इसकी वजह यह है कि एक लगातार एंटी सेकुलरिज्म वाले जो गिरोह हैं वह एक चार्ज लेबल करते रहे हैं कि मुसलमानों का जो है तुष्टिकरण होता है तो तुष्टिकरण के आरोप से बचने के लिये उनका अपना डिफेन्स मैकेनिज्म है कि भाई हमें सरकार से मिलने वाले ग्रांट नहीं चाहिये, आप रखें. हम जिस तरह से रुखी-सुखी रोटी खाकर अपनी जिंदगी चला रहे हैं, चला लेंगे. तो यह एक तरह का रिएक्शनरी कदम है. जिससे हम कह रहे हैं हमें बख्शिये, तुष्टिकरण के नाम पर हमारी पिटाई बंद कीजिये.
सवाल-    मुस्लिम समुदाय में जो सांस्कृतिक बदलाव हो रहे हैं इसकी दिशा भविष्य में क्या होगी.
जवाब-   मुझे लगता है कि मुस्लिम समुदाय को किसी भी तरह से एक सांस्कृतिक समुदाय समझना गलती होगी. भारत का मुस्लिम समुदाय होमोजिनिअस कम्युनिटी नहीं है. जिसको आप भारत का मुस्लिम समुदाय कहते है इसके अंदर बहुत सी कम्युनिटिज है और यह कम्युनिटिज पहले तो वर्ग के आधार पर बंटी हुयी है. इसकी जो आर्थिक स्थिति है वहीं तय कर रही है यह किस तरह से जीवन निर्वाह करेगी.

Friday, September 4, 2015

दैनिक भास्कर एवं लोकमत समाचारपत्र के संपादकीय पृष्ठ का तुलनात्मक अध्ययन
(विशेष संदर्भ: नागपुर संस्करण)
ज़ीशान
प्रस्तावना:
पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सूचना देना, शिक्षित करना एवं मनोरंजीत करना मात्र नहीं है बल्कि इसके द्वारा एक ऐसे स्वास्थ्य समाज का निर्माण करना है जो वैचारकी और तार्किकता से पूर्ण हो. ऐसे में समाचारपत्र एवं इसके कंटेंट काफी महत्त्व रखते है क्योंकि समाचारपत्र संचार माध्यमों के रूप में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है. इसका स्वरूप, वैचारकी और चीजों को प्रस्तुत करने का नजरिया अन्य माध्यमों की तुलना में बिल्कुल भिन्न होता है. एक समाचारपत्र का काम इतना ही नहीं है कि वह तीव्र गति से समाचार मुद्रित कर लोगों तक पहुंचा कर रह जाए बल्कि इससे भी आगे एक समाचारपत्र का काम है कि वह जिस समाज में वह प्रसारित हो रहा है उस समाज की परिवर्तनशीलता की विश्वसनीय तस्वीर सामने लायें. साथी ही समाज में परिवर्तन की चेतना जागृत करना, समाज को जागरूक और जिम्मेदार बनाना, जनमत तैयार करना आदि इसके महत्वपूर्ण कार्य हैं. इसीलिए आज हम बिना समाचारपत्र के किसी आधुनिक समाज की कल्पना ही नहीं कर सकते.
समाचारपत्र में प्रकाशित होने वाला संपादकीय पृष्ठ, किसी भी समाचारपत्र का एक महत्वपूर्ण पृष्ठ होता है. यह समाचारपत्र के वैचारकी स्तर एवं दूरदर्शिता आदि को प्रकट करता है. संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित होने वाला हर एक विषय-समग्री पत्रकारिता के दृष्टिकोण से भी बहुत महत्वपूर्ण होता है. इस पृष्ठ पर प्रकाशित होने वाला  विषय-समग्री वैचारकी स्तर से उन्नत  होना चाहिए. मूल रूप से कहा जाए तो यह समाचारपत्र के वैचारकी स्टैंडर्ड को भी प्रदर्शित करता है.
शोध अध्ययन का उद्देश्य
1.      संपादकीय दृष्टिकोण और सामाजिक सरोकारों के अंतरसंबंध को ज्ञात करना.
2.      दो विभिन्न समाचारपत्रों के संपादकीय पृष्ठ का अध्ययन एवं विश्लेषण करना.
3.       साथ ही यह ज्ञात करना कि दोनों समाचारपत्र किस प्रकार का वैचारकी उत्पन्न कर रहा है.
शोध अध्ययन का महत्त्व
1.      समकालीन समस्याओं का मीडिया की दृष्टि से अध्ययन.
2.      लोकतांत्रिक संचार के रूप में पाठक के प्रतिपुष्टि का अध्ययन.
3.       संवाद की तकनीकी समस्याओं का अध्ययन.
शोध अध्ययन की सीमा:
1 अप्रैल, 2015  से 15 अप्रैल, 2015 तक के दैनिक भास्कर एवं लोकमत समाचार के संपादकीय पृष्ठ के विषय समग्रियों का अंतर्वस्तु-विश्लेषण किया गया है. जिसकी कुल दिनों की संख्या 15 हैं.
शोध प्रविधि:
इस शोध अध्ययन को पूर्ण करने के लिए अंतर्वस्तु-विश्लेषण पद्धति का प्रयोग किया गया है. साथ ही विश्लेषण के लिए मात्रात्मक एवं गुणात्मक विधि अपनाई गई है.
शोध-स्वरुप
प्रस्तुत शोध अध्ययन के अंर्तगत दो समाचारपत्रों क्रमशः दैनिक भास्कर एवं लोकमत समाचार के संपादकीय पृष्ठ का अध्ययन किया जा रहा है. दोनों समाचारपत्रों के संपादकीय पृष्ठ पर किस प्रकार की विषय-समग्रियां प्रकाशित की जा रही है, दोनों समाचारपत्रों में प्रकाशित हो रही विषय-समग्रियों में किस प्रकार का अंतर है और कौन-सा समाचारपत्र संपादकीय पृष्ठ के लिहाज से ज्यादा प्रभावी है इस शोध अध्ययन के अंतर्गत इसका आकलन करना है.

 समाचारपत्रों के संपादकीय पृष्ठ का अंतर्वस्तु विश्लेषण
दैनिक भास्कर एवं लोकमत समाचार के संपादकीय पृष्ठ की विषय समग्री प्रस्तुत सारणी के द्वारा प्रस्तुत करने की कोशिश की जा रही है एवं इस सारणी के माध्यम से यह दिखाने की कोशिश की जा रही है कि इन पंद्रह दिनों के अंतर्गत दोनों समाचारपत्रों में किस-किस तरह के लेखों एवं अन्य प्रेषित समग्रियों को जगह दी गई है. साथ ही दैनिक भास्कर एवं लोकमत समाचार के लेखों एवं अन्य समग्रियों में क्या-क्या अंतर पाया गया है-
सारणी
क्रमांक
पृष्ठ
दैनिक भास्कर में कुल लेखों की संख्या
लोकमत समाचार में कुल लेखों की संख्या
दैनिक भास्कर एवं लोकमत समाचार के कुल अंतर्वस्तु में अंतर
1.
संपादकीय
13
22
-09
2.
अग्रलेख
13
22
-09
3.
संपादक के नाम पत्र
00
26
-26
4.
पुरूष लेखक
11
20
-09
5.
महिला लेखिका
02
02
00
6.
प्रिंट लाइन
00
11
-11
7.
प्रेरक प्रसंग
13
11
2
8.
धार्मिक प्रसंग
02
05
-3
9.
राजनैतिक लेख
09
18
-09
10.
स्वास्थ से जुड़े लेख
01
02
-01
11.
कृषि से जुड़े लेख
01
00
01
12.
शिक्षा से जुड़े लेख
02
01
01
13.
पर्यावरण से जुड़े लेख
00
01
-01
14.
विज्ञान से जुड़े लेख
09
01
08
15.
इंटरनेट/ ब्लॉग
45
00
45
16.
उद्धरण   
13
11
02
17.
अन्य
16
17
-01

निष्कर्ष एवं विश्लेषण :-
उपरोक्त सारणी द्वारा दैनिक भास्कर एवं लोकमत समाचार के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित होने वाले विषय समग्रियों की अंतर्वस्तु विश्लेषण करने के पश्चात पता चलता है कि कुल 15 दिनों के दैनिक भास्कर में प्रकाशित होने वाले संपादकीय की संख्या 13 है जबकि लोकमत समाचार में इसकी संख्या 22 है. इस आधार पर दैनिक भास्कर की तुलना में लोकमत समाचार में 9 संपादकीय ज्यादा प्रकाशित हुए.
जब दोनों समाचारपत्रों में प्रकाशित होने वाले अग्रलेखों का विश्लेषण किया गया तो दैनिक भास्कर में प्रकाशित होने वाले लेखों की संख्या 13 पाई गई जबकि लोकमत समाचार में इसकी संख्या 22 थी तो इस आधार पर दोनों समाचारपत्रों में प्रकाशित होने वाले अग्रलेखों की संख्या में 11 अग्रलेखों का अंतर पाया गया अर्थात दैनिक भास्कर की अपेक्षा लोकमत समाचार में 11 अग्रलेख इन पंद्रह दिनों में ज्यादा प्रकाशित हुए.
आगे जब दैनिक भास्कर में प्रकाशित होने वाले ‘संपादक के नाम पत्र’ का तुलना लोकमत समाचार केसंपादक के नाम पत्रसे किया गया तो यह पाया गया कि दैनिक भास्कर मेंसंपादक के नाम पत्रप्रकाशित ही नहीं होते हैं जबकि दैनिक भास्कर की तुलना में लोकमत मेंसंपादक के नाम पत्रप्रकाशित तो होते है लेकिन इन 15 दिनों के विश्लेषण के उपरांत केवल 26 ही पाठकों के पत्र प्रकाशित हुए है. इस आधार पर यह कहां जा सकता है कि दोनों ही समाचारपत्रों का जुड़ाव पाठकों के बीच कम है.
15 दिनों के शोध कार्य के दौरान विशेष रूप से यह देखा गया कि दोनों ही समाचारपत्रों में प्रकाशित होने वाले लेखों में महिला एवं पुरूष का प्रतिनिधित्व कितना है. दैनिक भास्कर में महिला लेखिकाओं  से संबंधित लेखों की संख्या 2 पाई गई तो लोकमत समाचार इसकी संख्या भी 2 थी. दैनिक भास्कर में प्रकाशित होने वाले लेखों में पुरूष लेखकों की संख्या 11 तो लोकसभा में पुरूष लेखकों की संख्या 20 पाया गया. इस आधार पर साफ कहा जा सकता है कि पुरूष लेखकों की तुलना में महिला लेखकों का प्रतिनिधित्व दोनों ही समाचारपत्रों में लगभग नगन्य है.
जब अन्य विषय समग्रियों का विश्लेषण किया गया तो यह पाया गया कि दैनिक भास्कर में संपादकीय पृष्ठ परप्रिंट लाईनप्रकाशित नहीं होता है जबकि लोकमत समाचारपत्र के संपादकीय पृष्ठ परप्रिंट लाईनप्रकाशित होता है.प्रेरक-प्रसंगसे जुड़े विषय में दोनों समाचारपत्रों में 2 अंतर्वस्तु की असमानता पाई गई जबकि धार्मिक प्रसंग से जुड़े लेखों की संख्या में 3 का अंतर पाया गया. दैनिक भास्कर में इसकी संख्या 2 तो लोकमत समाचार में इसकी संख्या 5 थी.
लोकमत समाचार में ज्यादा संपादकीय एवं अग्रलेख प्रकाशित होने की वज़ह से दैनिक भास्कर की अपेक्षा लोकमत समाचार में ज्यादा राजनैतिक लेख प्रकाशित हुए. दोनों ही समाचारपत्रों में प्रकाशित होने वाले राजनैतिक लेखों में 09 लेखों का अंतर पाया गया. दैनिक भास्कर में इस दौरान कुल 09 राजनैतिक लेख प्रकाशित हुए जबकि लोकमत समाचार में प्रकाशित होने वाले लेखों की संख्या 18 थी. स्वास्थ्य से जुड़े लेख जहां दैनिक भास्कर में 01 प्रकाशित हुए तो लोकमत समाचारपत्र में इसकी संख्या 02 थी. कृषी से संबंधित लेख दैनिक भास्कर में 1 थी, तो लोकमत समाचार में इसकी संख्या शून्य थी. शिक्षा से जुड़ी लेखों की संख्या दैनिक भास्कर में 02 थी तो लोकमत समाचार में इसकी संख्या 01 थी. पर्यावरण से जुड़े लेखों की संख्या दैनिक भास्कर में शून्य थी तो लोकमत समाचार में इसकी संख्या 01 थी, विज्ञान से जुड़े लेखों की संख्या दैनिक भास्कर में 9 थी तो लोकमत समाचार में इसकी संख्या 1 थी. इस आधार पर दोनों ही समाचारपत्रों पर प्रकाशित होने वाले विज्ञान सं संबंधित समाचार में 8 लेखों का अंतर पाया गया .
इस विश्लेषण के दौरान एक बात और सामने आई कि दैनिक भास्कर में इंटरनेट/ब्लॉग से जुड़े समग्रियों को संपादकीय पृष्ठ पर विशेष रूप से प्रकाशित किया जाता है तो दूसरी ओर लोकमत समाचार में इसके लिए कोई स्थान नहीं है. इस दौरान दैनिक भास्कर में इंटरनेट/ब्लॉग से संबंधित प्रकाशित होने वाले समग्रियों की संख्या संपादकीय पृष्ठ पर 45 थी जबकि लोकमत समाचार में इसकी संख्या नगण्य थी. विश्लेषण के उपरांत यह पाया गया कि दोनों ही समाचारपत्रों के संपादकीय पृष्ठ पर एक-एक उद्धरण प्रकाशित होते है. जबकि अन्य लेखों की संख्या दोनों ही समाचारपत्रों में क्रमशः 16 एवं 17 रही.

सुझाव:
प्रस्तुत शोध कार्य में जो निष्कर्ष सामने आए है इस आधार पर दोनों ही समाचारपत्रों के लिए निम्नलिखित सुझाव हैं :-
1    संपादक के नाम पत्र -
पाठकों की प्रतिक्रियाए, राय एवं विचार जानने का किसी भी समाचारत्र के लिएसंपादक के नाम पत्र’  एक बहुत ही महत्वपूर्ण साधन है. यह मूल रूप से संचार के जो पांच तत्व है, संप्रेषक, संदेश, माध्यम, संग्राहक एवं प्रतिपुष्टि को पूर्ण करता है. अगर किसी समाचारपत्र मेंसंपादक के नाम पत्रही प्रकाशित नहीं होता हो तो ऐसे में उसके द्वारा किया गया संचार ही अधुरा है.संपादक के नाम पत्रउस संचार प्रतिक्रिया की प्रतिपुष्टि करता है जो समाचारपत्रों में प्रस्तुत समग्रियों के द्वारा संचारित की गई है. इस आधार पर समाचारपत्रों मेंसंपादक के नाम पत्रप्रकाशित होना परम् आवश्यक है ताकि यह स्पष्ट हो सकें कि जो समग्री समाचारपत्र द्वारा प्रकाशित की जा रही है उसका धनात्मक प्रभाव पड़ रहा है. साथ ही पाठकों के इन प्रतिक्रियाओं के द्वारा पाठकों के मस्तिष्क में चल रहे विचारों एवं राय की भी जानकारी समाचारपत्र तक पहुंचती है. इस आधार पर समाचारपत्रों मेंसंपादक के नाम पत्रको विशेष स्थान देना चाहिए.
2    महिला लेखिकाओं को प्रोत्साहन देना चाहिए -
भारत की लगभग एक सौ बाईस करोड़ आबादी में महिलाओं लेखिकाओं का प्रतिनिधित्व शून्य प्रतित होता है. इस शोध अध्ययन के अंतर्गत जब दोनों समाचारपत्रों के अंतर्वस्तु का विश्लेषण किया गया तो इसके उपरांत दोनों समाचारपत्रों में प्रकाशित होने वाले लेखों में महिला लेखिकाओं की प्रकाशित लेखों की संख्या केवल 02 रही. इस आधार पर यह कहां जा सकता है जो प्रतिनिधित्व लेखिकाओं का होना चाहिए वह नहीं है अर्थात उनकी  संख्या अप्रयाप्त है. सुझाव के तौर पर यह विशेष तौर से कहां जा सकता है कि लेखिकाओं को विशेषतौर पर प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है.
3    संपादकीय एवं अग्रलेखकों की विश्वसनियता -
संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित यह दो समग्री समाचारपत्रों के लिए काफी महत्वपूर्ण है. सही मायने में यह समाचारपत्र के दिशा निर्धारण करने का कार्य करती है, साथ ही इसके द्वारा समाचारपत्र के राय एवं विचार पाठकों के सामने प्रस्तुत होते है. ऐसे में समाचारपत्रों की आवश्यकता है कि वह ऐसी समग्रियों का चुनाव करें जो समाचारपत्र की विश्वसनियता बनाए रखें. ऐसा हो कि कुछ ऐसी सामग्रियां प्रकाशित की जाये जिसका कोई सामाजिक प्रासंगिकता हो ही नहीं. यह विशेष तौर से ध्यान देने योग्य बात है कि जो भी अंतर्वस्तु प्रकाशित की जाये वह जनमानस के हित में हो. तभी समाचारपत्र की विश्वसनियता बनी रहेगी अन्यथा इसके विश्वसनियता में ह्रास होगा.
4    इंटरनेट एवं ब्लॉग-
वर्तमान में इंटरनेट का दखल आम जीवन में काफी भीतर तक हो गया है. यह हमारे हर एक दिनचर्या में सहभागी है. ऐसे में जहां तक संभव हो इंटरनेट एवं ब्लॉग के विचार भी प्रकाशित होनी चाहिए ताकि पाठकों का रूझान समाचारों के प्रति बना रहे. दैनिक भास्कर स्वयं के संपादकीय पृष्ठ का लगभग आधा पृष्ठ इंटरनेट एवं साइबर वर्ल्ड से संबंधित समग्री के लिए देता है जबकि लोकमत में इसके लिए कोई स्थान नहीं है.
5   स्वास्थ्य, कृषि, शिक्षा एवं पर्यावरण से संबंधित लेख-
इन सारी विषयों से संबंधित लेखों को प्रकाशित करने की आवश्यकता है. जब इन दोनों समाचारपत्रों के विषय समग्रियों का अंतर्वस्तु-विश्लेषण किया गया है तो इन सारी विषयों से जुड़ी प्रकाशित लेखों में कमी पाई गयी जबकि यह दोनों समाचारपत्र महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र से प्रकाशित होते है. जहां पर एक बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर है. यहां पानी की समस्या है, पर्यावरण की समस्या है, यह क्षेत्र महाराष्ट्र के सबसे पिछले क्षेत्रों में गिना जाता है जहाँ आय-दिन किसान आत्महत्या करते रहते हैं. इस आधार पर समाचारपत्र के संपादकों यहां के स्थानीय मुद्दों को भी संपादकीय पृष्ठ पर जगह देनी चाहिये.

संदर्भ ग्रंथ :
1. दैनिक भास्कर के 1 अप्रैल, 2015  से 15 अप्रैल, 2015 तक के नागपुर संस्करण के प्रकाशित समाचारपत्र
2. लोकमत समाचारपत्र के 1 अप्रैल, 2015  से 15 अप्रैल, 2015 तक के नागपुर संस्करण के प्रकाशित समाचारपत्र
3. पंत, एन.सी : पत्रकारिता एवं संपादन कला, राधा पब्लिकेशन्स, नई दिल्ली
4. शर्मा, डॉ ठाकुर दत्त ‘आलोक:  हिंदी पत्रकारिता एवं जनसंचार, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली
5. धर्मेंद्र, डॉ बी. आर : हिंदी पत्रकारिता में संवेदना अैर पीत प्रभाव, अयन प्रकाशन, नई दिल्ली
6. कुलश्रेष्ठ, डॉ विजय:  फिचर लेखन, एम.बी. पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स,  जयपुर
7. वर्मा, डॉ सुजाता:  पत्रकारिता प्रशिक्षण एवं प्रेस विधि, आशीष प्रकाशन, कानपुर
8. तिवारी, डॉ अर्जुन:  सम्पूर्ण पत्रकारिता, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी
9. http://www.dainikbhaskargroup.com/dainik-bhaskar.php
10.http://www.lokmat.net/lokmat-samachar.html

- मूल लेख अंतरराष्ट्रीय सामाजिक शोध पत्रिका 'इंडियन स्ट्रीम रिसर्च जर्नल' के मई, 2015 के अंक में प्रकाशित