Sunday, September 6, 2015

शिबा असलम फहमी भारत की उन चुनिंदा मुस्लिम महिला बुद्धिजीवियों में से एक हैं जो अपनी बेबाक लेखनी और भाषा के द्वारा मुस्लिम समुदाय से जुड़ी विषयों पर हमेशा लिखती- बोलती रहती हैं. जो पेशे से पत्रकार, समाजसेवी और मुस्लिम नारीवादी लेखिका हैं. उनसे मुस्लिम समुदाय, बाज़ार  और मीडिया विषय पर जीशान की बातचीत-

सवाल-  बाज़ार ने हर तबके को अपने चपेट में लिया है ऐसे में आप मुस्लिम समुदाय को कैसे देखती हैं?
जवाब-  मेरे हिसाब से भारत का समुदाय और मुस्लिम समुदाय बाजारवाद के हमलों से बंटा हुआ नहीं हैं यह बिलकुल उसी तरह का समुदाय है जिसकी क्रय क्षमता के अनुसार बाज़ार दूसरे समुदाय को प्रभावित करते हैं. मुस्लिम समुदाय को इन बाज़ार के हवाले से अलग कर के देख पाना मुझे लगता है कि गैर जरूरी है क्योंकि बाज़ार हमें मुख्य तौर पर क्या देता हैं वह है तकनीक. मुसलमानों के किचन बदल गए हैं मुसलमान युवाओं के कपड़े बदल गए हैं और रोजमर्रा के जीवन में जो उत्पाद इस्तेमाल किये जा रहे है इसका निर्धारण अब बाज़ार कर रहा है उसी तरह जैसे किसी अन्य समुदाय के जीवन में. इसके अलावा बाज़ार ने हमारे स्वास्थ्य में, शिक्षा में जो परिवर्तन लाये है हमारी आकांक्षाये, इच्छाये वहीं है तो बाज़ार को आप अच्छा माने या बुरा लेकिन यह लोगों को सेक्युलर बनाये रखता है और यह वैचारिक रूप से आपको प्रभावित करने में फर्क नहीं करता. लेकिन कुछ चीजे ऐसी है जो मीडिया से सम्बंधित है वह थोड़ी सी अलग है. खासकर पॉपुलर मीडिया से, जिसे हम मनोरंजन उद्योग कहते है. मनोरंजन उद्योग ने बाज़ार के साथ मिलकर एक खास प्रकार का हिन्दू वर्चस्ववादी सोच को विकसित करना शुरू किया है. जितने भी टीवी सीरियल है, जितने भी टीवी कार्यक्रम है उनमें भगवान की पूजा अर्चना, व्रत, हवन और इसी प्रकार के क्रमकांडों को करते हुए दिखाया जाता है, यहीं नहीं कौन बनेगा करोड़पति जैसा क्विज बेस्ड जानकारियों भरा कार्यक्रम में भी  फास्टर फिंगर फस्ट से लेकर आगे पूछे जाने वाले सवाल हिंदू धर्म से जुड़े होते हैं. हिंदू देवी देवताओं के मान्यताओं के आधार पर सवाल किये जाते है. जबकि भारत में दूसरे धर्म भी हैं. भारत में जैन धर्म है, बौद्ध धर्म है, सिख धर्म है, पारसी धर्म है, ईसाई धर्म भी है. लेकिन इन सबके हवाले से कोई सवाल कभी नहीं उठता. अगर कौन बानेगा करोड़पति जैसा प्रोग्राम जो हमें लगता है सेक्युलर सा प्रोग्राम है, जानकारी आधारित प्रोग्राम है अगर इसमें इतने बारिकी से एक खास संस्कृति और धर्म और उनके परम्पराओं को बढ़ा रहा है और इसे हमारे मुख्य धारा का हिस्सा बनाया जा रहा है. भारत से संदर्भ में इसे एकल संस्कृति कारन के रूप में देख या  जा रहा है जो बाज़ार और मीडिया के जरिये फैलाई जा रही है.
सवाललेकिन जब हम वैचारिक रूप से इतर इसे एक प्रोडक्टिविटी के तौर पर देखते है तो ये पश्चिमी वर्चस्व आधारित दिखता है, ऐसा क्यों?
जवाब-   पश्चिमीकरण की जब हम बात करते हैं तो वेश-भूषा में बदलाव की बात की जाती है लेकिन ऐसा नहीं है. इस तरह के कपड़े हम पहले भी पहनते थे. जब इस तरह का मीडिया का हमारे जिंदगी में प्रभाव नहीं था. 24 घंटे के चैनल इन्वेंट नहीं हुए थे. देखिये बहुत बड़ा फर्क पड़ा है जब से 24 घंटे का न्यूज़ चैनल या टीवी चैनल हमारे जिंदगी में आये हैं. पहले जब दूरदर्शन शाम को कुछ घंटे के लिए प्रसारित होता था और आज का जो टीवी है जो 24 घंटे का है जो एक ऐसा राक्षस है जिसका पेट कभी भरता ही नहीं. इसे हर समय कुछ न कुछ दिखाना होता है. ये वाला जो समय है जिसके हमारे जिंदगी में आने के लगभग 25 साल हुए है इससे हम बिलकुल ग्लोबलाइज्ड हुए है.
सवाल –  सामुदायिक संस्कृति के ह्रास में मीडिया को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है क्या आप इस बात से सहमत है?
जवाब-   आप सामुदायिक सांस्कृतिक से क्या समझते है कम्युनिटी लाइफ, कम्युनिटी कल्चर
हां बिलकुल,
लेकिन मुझे नहीं लगता है. एक तो यह कम्युनिटी कल्चर एक बड़ी अच्छी चीज है जिसे हर हाल में बचाना चाहिए मुझे तो इस बात से ही एतराज है. कम्युनिटी कल्चर जो हमारे गांवों में है वह दलितों और महिलाओं के उत्पीड़न का कल्चर है हम उसे कैसे बचाने की बात कर सकते है बहरहाल, हमें उनमें बदलाव चाहिए. शहरों में जो घेटोराइजेशन है माइनॉरिटीज का वह कम्युनिटी कल्चर का हिस्सा बन चुका है हमें उससे बचना चाहिये. हमें उसे तोड़ना चाहिये. कम्युनिटी कल्चर कौन-सा हमें बचाना है और कौन-सा हमें छोड़ना है इसके प्रति हमें जागरूक होना चाहिये. दूसरी बात यह है कि आज कम्युनिटी कल्चर बढ़ा भी है. आज जिस तरह के महंगे-महंगे कार्यक्रम होते है सत्संग होते है, जागरण होते हैं शहरों से लेकर कस्बों तक. इससे एक दूसरे तरह का कम्युनिटी कल्चर बढ़ा भी है. आज एक खास बाबाओं के इर्द-गिर्द जो कम्युनिटी विकसित हुयी है जो उनको अपना बाबा या फिर अपना संत मानते है तो ये आप के समुदाय बन जाते है.
सवाल-    लेकिन जब मुस्लिम कम्युनिटी के संदर्भ में बात करते है तो यह सारी चीज नगण्य हो जाती है.
जवाब-   हां, बिलकुल ठीक है लेकिन इस्तेमे, सिरातुन नबी कम्युनिटी, कुछ जमियत, कुछ मुशावारातें है. देखिये किसी भी समाज में कम्युनिटी लाइफ का फ़ॉर्मेशन होना लाजमी बात है और यह होता है. यह मुसलमानों में भी है लेकिन इनमें उतनी अग्रेसिवली नहीं हो रहा है और वह महदूद है धर्म के इर्द-गिर्द. पुराने ज़माने में हमारे घरों में मिलाद होते थे वो आज कम हो गए है, सिरातुन नबी के जलसे आम होते जा रहे है तो यह फर्क तो है.
सवाल-   मुस्लिम महिलाओं में भी परिवर्तन देखे जा रहे है. फैमिली वैल्यूज की कमी में क्या इनकी कोई भागीदारी दिखती है?
जवाब-   मुझे लगता है जिसको आजकल हमलोग फैमिली वैल्यूज के कमी कमी के तौर पर देखते हैं या महिलाओं में टीवी सीरियल्स, मनोरंजन के लिए समय बंध गए हैं ऐसा क्यों न हो? पुरुष अपने लिए अपनी शराब, अपनी महफ़िल, अपनी अड्डेबाजी, अपने चाय की दुकान के लिए हमेशा से समय निकलता है. अगर वो कोई ख़राब बात नहीं थी तो घर में बैठकर टीवी देखना कैसे ख़राब बात है. और अपने मनोरंजन के लिए समय तय कर देना या इस तरह से काम निपटाना कि जब उनके पसंद का सीरियल आये वह फ्री हो जाये तो यह कौन-सी ख़राब बात है. अगर मुस्लिम महिलाओं ने भी जीने की अभिलाषा, जिज्ञासा और जागरूकता बढ़ायी है तो इसमें गलत बात क्या है. इसपर सवाल उठाना मुझे लगता है मर्दवादी दृष्टिकोण है. हां, लेकिन इनमें गुणवत्ता की बात जरुर होनी चाहिये. जब वह अपने लिये समय निकाल रही है तो उस समय में क्या देख रही है उस समय में वह वहीं देख रही है जो कोई और अन्य महिला देख रही है भारत की. तो एक समुदाय के आधार पर ये तय करना पड़ेगा क्या स्वीकार करना है और क्या नहीं? और यह सिर्फ मुसलमान समुदाय नहीं तय कर सकता है. वह सिर्फ हिंदू समुदाय भी तय नहीं कर सकता. इसके लिए देश व्यापक बहस होनी चाहिए, एक सामाजिक मंथन होना चाहिये.
सवाल-    वैश्विक बाज़ार एक वैश्विक समाज का निर्माण कर रहा है, आपकी क्या राय है?
जवाब-     एक मुस्लिम महिला के तौर पर मुझे लगता है आज मैं जितनी बेहतर स्थिति में थी उतनी बेहतर स्थिति में पहले कभी नहीं थी. तमाम बुराइयों के बावजूद एक महिला के तौर पर आज मुझे बहुत से चॉइस मिली है. चुनने का अधिकार मिला है, मुझे रिप्रोडक्टिव हेल्थ चुनने का अधिकार मिला है जिसमें बहुत हद टेक्नोलॉजी का अहम् योगदान है इसलिए आज हम टेक्नोलॉजी को कोस नहीं सकते. टेक्नोलॉजी से दुनिया करीब आयी है, आज ग्लोबलाइजेशन से यह फर्क आयी है कि अमेरिका का मज़दूर, चाइना का मज़दूर और भारत का मज़दूर आज एक होकर बात कर सकता है. सीरिया में जो हो रहा है, उसमे सऊदी अरब और इजराइल का जो रोल है हम उस पर सम्मिलित रूप से बात कर सकते हैं. हमें ये ग्लोबलाइजेशन से ही मिला है. हमें ये वही मीडिया से ही मिला है तो आप मीडिया को किस तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं इसके लिए आप अगर जागरूक होकर मंथन नहीं करेंगे तो आप इस भावना का शिकार होंगे की आज महिला समय का गलत इस्तेमाल कर रही हैं. लेकिन हमारे बच्चे, हमारे युवा, हमारे पुरुष भी कौन सा अच्छा काम रहे है वह डीजे कल्चर में, वह हनी सिंह कल्चर में, वह पोपुलर कल्चर में फंसे हुए हैं. हमें यह याद रखना चाहिये वेस्ट हमें अपना पीछ लग्गू बनाये रखने के लिए कौन-कौन सा आइटम्स देता है.
सवाल-     मीडिया द्वारा प्रस्तुत किये जा रहे मानसिक कचड़े जो बहुतयात मात्रा में पश्चिम से आयतित है,  क्या यह फैमिली वैल्यूज के ह्रास का कारक है?
जवाब-      वेस्ट या अमेरिका जिस वजह से आज दुनिया पर राज कर रहा है. जो उसके सबसे बड़े टेक्नोलॉजी है जो उनके सबसे बड़े दिमाग हैं, जो सबसे बड़े साइंटिस्ट है, जो सबसे बड़े एक्सपर्ट है उनके बारे में वह जानकारियां नहीं देता है. वह किस स्तर पर है हम सिर्फ परिकल्पना कर सकते हैं कि वह कितना आगे निकल चूका है. उन्हें तो वह अपने राज और गुनाहों की तरह हम से छुपा कर रखे हुए है. वह हमें देता क्या है वह हमें ग्रैमी अवार्ड या ऑस्कर अवार्ड का चकाचौंध भरा कार्यक्रम पूरे दुनिया को देता है. वह हमें पॉपुलर म्यूजिक से जुड़े हुए कभी रैप म्यूजिक, कभी बीटल्स देता है. हमारे पास जो उनके फ़िल्में आती हैं जिसमें वह एलियन से लड़ते हैं किसी विशालकाय जीव से लड़ते हैं जैसे कि उनकी संस्कृति में सामाजिक समस्याएं सारी ख़त्म हो गयी हैं. अब उनके लिए एलियन से लड़ना या बहुत बड़े कीड़े-मकौड़े से लड़ना का ही कार्यक्रम बचा है जैसे उनके समाज की वह सारी समस्या हल कर चुके हैं हमें वह यह एजेंडा देते हैं अपने को परफेक्ट बताते हुए. वह मनोरंजन इंडस्ट्री के हवाले से तय करते हैं कि हमारा युवा उनसे किस प्रकार प्रभावित होगा. उनके वैज्ञानिक, बड़े दिमाग क्या कर रहे हैं, अगला उनका टारगेट क्या है. वह तो अपने चीजे ऐसे छुपा कर रखते हैं जैसे अपना गुनाह. तो ऐसे में हमें यह पता ही नहीं वह जो दुनिया पर शाषण कर रहे हैं उसका आधार क्या है.
सवाल-    तो ऐसे में क्या भारत मुस्लिम लीडरशिप की कमी महसूस होती है?
जवाब-    लीडरशिप का तो बोहरान है. मुसलमानों के जो सियासी लीडर हैं वह इस आधार पर काम कर रहे हैं और हमें यह एजेंडा देते हैं कि कितने पॉलिटिशियन, कितने एमपी, एमएलए विधानसभा और पार्लियामेंट में पहुँच रहे हैं और कितने मुसलमान सुर्फाओं को लाल बत्तियां मिली हैं. लेकिन वह यह नहीं देखते की मुसलमान अवाम के लिये पॉलिसीज क्या आ रही हैं. आज पार्लियामेंट में कितना कम मुसलमान रह गया है इसका बड़ा शोर है लेकिन जब वहां सबसे ज्यादा मुसलमान सदस्य थे तो वह मुसलमानों की शिक्षा, मुसलमानों की स्वास्थ्य, मुसलमानों की रोजगार को बढ़ाने की पालिसी साजी में कितना कारक बन पाये, कितना उसको प्रभावित कर पाये. इसका आंकलन हमारे पास नहीं हैं. हमें इस भ्रम से बचना चाहिये कि कुछ मुसलमानों को निजी तौर पर लाल बत्तियां मिल जाये, वह किसी कमेटी के चेयरमैन बन जाये, किसी कमीशन के चेयरमैन बन जाये या वह मंत्री बन जाये इससे मुसलमानों को कोई फर्क नहीं पड़ता है. इससे उस परिवार को फर्क पड़ता है जिस परिवार को लाल बत्ती मिलती है. यह तो सियासी लीडरशिप की बात हुई लेकिन धार्मिक लीडरशिप है असली गड़बड़ी हुई है. धार्मिक लीडरशिप ने लोगों को बहुत कामयाब जिंदगी बशर करने के लायक नहीं बनाया. उन्होंने आखरत की इतनी फिक्र हम पर लाद दी है और कल्चर बचाने की इतनी फिक्र हमारे अंदर थोप दी है कि हमारे युवा न अच्छे डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, चार्टेड अकाउंटेड और न अच्छे टीचर बन पाए. मुसलमानों का कॉन्ट्रिब्यूशन क्या है कुछ भी नहीं है.
सवाल-    अभी हाल ही में देवबंद वालों ने मदरसों को मिलने वाली सेंटर ग्रांट को लेने से इंकार कर दिया है. इस पर आप की क्या राय है?
जवाब-   मुझे नहीं पता इसके पीछे असली मंशा क्या है. हो सकता है वह यह चाहते हो कि सरकार का किसी भी प्रकार का हमारे ऊपर शिकंजा न हो, सरकार किसी भी तरह से हमें मॉनिटर न करें. अगर यह बात है तो मुझे यह बात अच्छी नहीं लगती है क्योंकि हम जितने ट्रांसपेरेंट होकर काम करेंगे वह बेहतर होगा. और हमारा हर तरह का सोशल ऑडिट हो, अकादमिक ऑडिट हो, फाइनेंसियल ऑडिट हो इससे संस्थान और अच्छे बनते हैं, उनकी नींव और भी मज़बूत होती है. उनमें पारदर्शिता आती है. दूसरी बात यह भी कि भारतीय मुसलमान सब्सिडी के खिलाफ भी कह रहा है हज सब्सिडी के खिलाफ है, मदरसे वाले भी कह रहे है कि हमें ग्रांट नहीं चाहिये. इसकी वजह यह है कि एक लगातार एंटी सेकुलरिज्म वाले जो गिरोह हैं वह एक चार्ज लेबल करते रहे हैं कि मुसलमानों का जो है तुष्टिकरण होता है तो तुष्टिकरण के आरोप से बचने के लिये उनका अपना डिफेन्स मैकेनिज्म है कि भाई हमें सरकार से मिलने वाले ग्रांट नहीं चाहिये, आप रखें. हम जिस तरह से रुखी-सुखी रोटी खाकर अपनी जिंदगी चला रहे हैं, चला लेंगे. तो यह एक तरह का रिएक्शनरी कदम है. जिससे हम कह रहे हैं हमें बख्शिये, तुष्टिकरण के नाम पर हमारी पिटाई बंद कीजिये.
सवाल-    मुस्लिम समुदाय में जो सांस्कृतिक बदलाव हो रहे हैं इसकी दिशा भविष्य में क्या होगी.
जवाब-   मुझे लगता है कि मुस्लिम समुदाय को किसी भी तरह से एक सांस्कृतिक समुदाय समझना गलती होगी. भारत का मुस्लिम समुदाय होमोजिनिअस कम्युनिटी नहीं है. जिसको आप भारत का मुस्लिम समुदाय कहते है इसके अंदर बहुत सी कम्युनिटिज है और यह कम्युनिटिज पहले तो वर्ग के आधार पर बंटी हुयी है. इसकी जो आर्थिक स्थिति है वहीं तय कर रही है यह किस तरह से जीवन निर्वाह करेगी.

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