Thursday, December 15, 2016


समय से मुठभेड़ कराती गुजरात फाइल्स
ज़ीशान
मीडिया में दम तोड़ते रिपोर्टिंग कला के बीच राणा अयूब की आई किताब गुजरात फाइल्स एनाटोमी ऑफ कवर-अप मौजूदा दौर में दो चीजों के लिए सुर्खिया बटोर रही है. पहली, उनकी साहसी खोजी पत्रकारिता के लिए और दूसरी गुजरात की गुजरे दौर की पुनः याद दिलाने के लिए. एक लिहाज से देखा जाये तो इस किताब की टाइमिंग बेहद मुफीद है. क्योंकि मीडिया रिपोर्टिंग को लेकर इन दिनों बहस काफी तेज़ है. खासकर ग्राउंड रिपोर्टिंग इन दिनों सवालों के घेरे में है. बीबीसी के लिए लिखे एक लेख में वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार अपनी बात रखते हुए कहते है कि आज की पत्रकारिता साउंड-बाइट पत्रकारिता बनकर रह गयी है जहां ग्राउंड रिपोर्टिंग और इनवेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग न के बराबर है. किसी घटना के एक जैसे ही विजुअल्स और बयान लगभग प्रत्येक समाचार चैनलों और समाचार-पत्रों में पढ़ने और देखने को मिल जायेंगे. आज की पूरी पत्रकारिता प्रेस नोट, प्रेस कांफ्रेंस और समाचार समितियों पर टिकी हुई है. आजकल समाचार-पत्रों, टेलीविजन और अन्य मीडिया संस्थानों में संवाददाताओं के बाई-लाइन स्टोरी कम ही दिखेंगे. अगर इनकी बात की ओर ध्यान दी जायें तो इस किताब ने साबित किया है अभी भी इनवेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग की प्रासंगिकता बनी हुई है.
गुजरात फाइल्स एक तरह से 2002 दंगे के दरम्यान तथा बाद के गुजरात में महत्वपूर्ण पदों पर आसीन लोगों के बीच की गयी गाल-बहेलियां हैं. जिसमें राणा एक एन.आर.आई मैथली त्यागी का रूप धारण कर एक टीनएज फ्रांसीसी लड़के के साथ गुजरात पर एक डाक्यूमेंट्री बनाने अमेरिका के एक फिल्म इंस्टिट्यूट से आई है. साल 2010 में अपनी आठ महीने की इस अथक खोजी पत्रकारिता के दरम्यान मैथली खुफियां कैमरे के साथ तत्कालीन प्रशासनिक अधिकारियों और राजनेताओं से मिलती है और उनकी बाते अपने कैमरें और ऑडियो रिकॉर्डर में कैद करती है. रिकॉर्ड की गयी यह बातें गुजरात के काले दिनों में राजनेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच सक्रीय संलग्ता का एक जीता जागता सबूत है, लेकिन अफसोस कि गुजरात उच्च न्यायालय को हालिया आये गुलबर्ग सोसाइटी नरसंहार निर्णय में इनकी कोई संलिप्तता दिखाई नहीं देती है.   
करियर के शुरूआती दिनों से पत्रकारिता क्षेत्र की चुनौती स्वीकार करती आई राणा अयूब को जब तहलका पत्रिका में गुजरात 2002 दंगे पर किये गए अपने खास रिपोर्टिंग के बाद गुजरात दंगे से जुड़े कुछ खास लिंक मिले तो बीमार रहते हुए अपने स्वास्थ्य की प्रवाह किये बगैर राणा अपना नाम और पता बदल कर दिल्ली से गुजरात चल पड़ती है. वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी अपने फेसबुक पेज पर लिखते हैं कि ‘तहलका की पूर्व खोजी पत्रकार राणा अयूब की यह किताब उन सभी भारतीयों को पढ़नी चाहिए जो देशभक्त, राष्ट्रवादी, लोकतंत्रवादी और मानवाधिकारवादी हैं. चूँकि यह किताब खोजी पत्रकारिता का बेजोड़ नमूना है, इसलिए युवा मीडिया कर्मियों के साथ-साथ मीडिया विद्यार्थियों के लिए भी यह एक प्रकार से कम्पास का रोल अदा करेगी.’  
गुजरात फाइल्स की भूमिका में राणा अयूब मीडिया हाउस के ताने-बाने से परिचित कराती हैं, जिसमें तीन साल की एक मासूम लड़की के साथ हुई बलात्कार की रिपोर्ट छोड़ उन्हें मुंबई के मानसून की विजुअल्स लाने की जिम्मेदारी दी जाती है. इस घटना के कारण अंदर से टूट चुकी राणा को उनके तत्कालीन संपादक पत्रकारिता की पाठ पढ़ाते हुए कहते हैं ‘एक अच्छे पत्रकार को स्टोरी से स्पेस बनाये रखने की कला सीखनी चाहिए और उसमें व्यवहारिकता होनी चाहिए. राणा आगे अपनी अफसोस का इज़हार करते हुए कहती हैं कि मैं इस कला की बारीकियां नहीं सीख पाई और अगले ही लाइन में वह इसकी जिम्मेदारी कॉर्पोरेट और सियासी घरानों पर डालती हुई देश के मीडिया के वर्क कल्चर पर तमाचा दे मारती हैं. इस किताब की शुरुआत राजनेता और नौकरशाह की आपसी गठजोड़ के साथ, जान जोखिम में डालकर नरसंहार और फर्जी मुठभेड़ से साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के जरिये सत्ता हासिल करने की कहानी बयां करती है. इस किताब में राणा अयूब ने एटीएस के जी.एल. सिंघल, राजन प्रियादर्शी, अतिरिक्त मुख्य सचिव अशोक नारायण, अहमदाबाद पुलिस कमिश्नर पी.सी. पांडे, इंटेलिजेंस प्रमुख जी. सी. रायगर तथा गुजरात दंगों में दोषी पाई गयी मंत्री माया कोडनानी से गुजरात के तमाम विवादित मुद्दों पर बातचीत की है.
पुलिस प्रशासन जैसे आला महकमे में भी कैसे कास्टीसिज्म हावी है इस बात की यह किताब तस्दीक करती हुई दिखाई देती है. राणा गुजरात के पूर्व ए.टी.एस. चीफ राजन प्रियादर्शी का जिक्र करते हुए बताती है कि राज्य के एक बड़े ओहदे पर काबिज हो जाने के बावजूद उन्हें जातिये भेद-भाव का शिकार होना पड़ता था. ऊँची जाति के कम रैंक के अधिकारियों के सामने भी उन्हें दोहरा रवैया झेलना पड़ता था. टाइम्स ऑफ़ इण्डिया में छपे एक खबर के मुताबिक राजन प्रियादर्शी बताते है कि राज्य के इतने महत्वपूर्ण पद का पदभार संभालने के बावजूद गाँव में वह स्वर्ण जातियों के इलाके में अपना घर नहीं खरीद सकते थे और कैसे गाँव का एक नाई उनके दलित होने की वजह से उनके बाल काटने से मना कर देता है(पेज न.-56). राणा जब राजन से सवाल करती है कि ‘मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात में काफी लोकप्रिय है, तो इसके जवाब में राजन कहते हैं- वह सबको बेवकूफ बनाते हैं और जनता बेवाकूफ बनती है. राणा अगले सवाल में उनसे पूछती है लॉ एंड आर्डर की यहाँ बुरी स्थिति है, कम ही ऑफिसर्स होंगे जो अपना काम ईमानदारी से करते होंगे. इसके जवाब में राजन कहते हैं, बहुत कम ही हैं, और आगे वह कहते हैं गुजरात में हुए मुस्लिम हत्याओं का जिम्मेदार नरेंद्र मोदी है (पेज न.-57).
राणा से बातचीत के दरम्यान जी. एल. सिंघल बताते है कि गुजरात में सारे मंत्रालय और मंत्री रबड़ स्टाम्प बने हुए थे. राज्य के सारे निर्णय नरेंद्र मोदी खुद ही लिया करते थे. यहाँ राणा उनसे पूछती है कि ‘आपके केस (फोन टेपिंग मामले) में जब गुजरात के तत्कालीन गृह राज्यमंत्री अमित शाह की गिरफ्तारी होती है तो मुख्यमंत्री की क्यों नहीं हुई. इसके जवाब में सिंघल कहते हैं- 2007 में सोहराबुद्दीन एनकाउंटर के बाद जब सोनिया गाँधी गुजरात आई तो उन्होंने नरेंद्र मोदी को ‘मौत का सौदागर’ कह दिया था. इसके बाद नरेंद्र मोदी हर सभा सम्मलेन में लोगों से यह कहने लगे सोहराबुद्दीन कौन था, उसको मारा तो अच्छा हुआ की नहीं? लोग उनके इस बात पर जयकारे लगाने लगे. इससे यह हुआ कि उन्हें जो चाहिए था उन्हें वह मिल गया(पेज न.-48).  
इस रोमांचक सफर का अंत बहुत ही आप्रत्याशित होता है. इस कहानी के आखरी कड़ी नरेंद्र मोदी से राणा की छोटी सी मुलाक़ात होने के बाद उन्हें वापस दिल्ली बुला लिया जाता है. दिल्ली वापस लौटने के बाद जब इनकी मुलाक़ात तहलका के मैनेजिंग एडिटर तरुण तेजपाल और शोमा चौधरी से होती है तो तरुण तेजपाल उनसे कहते हैं– देखों सोमा, बंगारू लक्ष्मण पर स्टिंग के बाद हमारा ऑफिस बंद कर दिया गया था. नरेंद्र मोदी एक पॉवरफुल आदमी है, भविष्य में वह प्रधानमंत्री बनने के कगार पर है. अगर हम उसको छुयेंगे तो ख़त्म हो जायेंगे(पेज न.-203). राणा उन्हें कनवेंस करने की कोशिश करती है और कहती है, कुछ ही दिन बाद उन्हें मोदी के दफ्तर से मुलाकात के लिए दोबारा फोन आने वाला है. लेकिन उनकी सारी दरयाफ्त बेकार चली जाती है. उसी शाम उसे मोदी के दफ्तर से मैसेज आता है कि मुख्यमंत्री उनसे मिलना चाहते हैं. लेकिन राणा बहाना बनाकर उनसे नहीं मिलती है और उसके दो दिनों के बाद वह अपना यूनीनोर सिम तोड़ डालती हैं (पेज न.-204). तब से मैथली इस कहानी से गायब हो जाती है और संपादक ने इस स्टोरी को आगे और फॉलो नहीं करने का निर्णय लेते हैं. तब से राणा आज तक चुप हैं.
आगामी यू.पी. विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र इस की किताब की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है. एक ऐसे समय में जब बीजेपी 2014 आम चुनाव का इतिहास आगामी विधानसभा चुनाव में भी बरक़रार रखना चाहती है ऐसे में इस किताब को लेकर आलोचनाएं भी हो रही है. इसे लेकर सोशल मीडिया पर भी आरोप-प्रत्यारोप की दौर जारी है. कई लोगों का मानना है कि वर्तमान समय में पब्लिसिटी पाने का आसान जरिया नरेन्द्र मोदी की आलोचना करना है. अलजज़ीरा चैनल पर मेहदी हसन के हेड टू हेड प्रोग्राम में अपने पक्ष का बचाव करते हुए राणा कहती हैं कि मैं देश के टीवी चैनल्स, समाचारपत्र-पत्रिका, ऑनलाइन न्यूज़पोर्टल और प्रकाशकों से बात की लेकिन किसी ने भी इसे प्रसारित या प्रकाशित करने के लिए हामी न भरी. आखिर में मैंने स्वयं ही इसे प्रकाशित करने की ठानी. मई 2016 में यह किताब मार्किट आई और 2 जून, 2016 तक अमेजन पर यह किताब बेस्ट सेलर किताबों की फहरिस्त में सबसे आगे थी.

किताब-गुजरात फाइल्स- एनाटोमी ऑफ़ कवर-अप 
लेखक- राणा अयूब
केटेगरी- नॉन-फिक्शन
भाषा- अंग्रेजी
मूल्य- 295 रु

Saturday, November 5, 2016

देश में आपातकाल की याद दिलाता माहौल
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वैकल्पिक इतिहासों के इस दौर में क्या आपातकाल की पटकथा लिखना संभव है? वह स्वतंत्र भारत के इतिहास का सबसे अंधकारमय वक्त था। कई लोगों ने उसका प्रतिकार किया था। इसमें पत्रकारिता (किसी ने मीडिया शब्द का प्रयोग नहीं किया) और न्यायपालिका भी शामिल थे। इससे क्रोध की एक ऐसी लहर पैदा हुई जिसने इंदिरा गांधी, उनके बेटे संजय गांधी और उनके तमाम चाटुकारों का सफाया कर दिया। कहा जा सकता है कि वे इतिहास के कूड़ेदान में समा गए। प्रधानमंत्री प्राय: आपातकाल लागू करना चाहते हैं, हमें ऐसी किसी घटना के दोहराव को लेकर चेताते भी हैं। उन्होंने इस सप्ताह भी ऐसा किया। रामनाथ गोयनका उत्कृष्ट पत्रकारिता पुरस्कार समारोह में भी उन्होंने ऐसा किया। रामनाथ गोयनका आपातकाल में पत्रकारिता के प्रतिरोध के प्रतीक रहे हैं। प्रधानमंत्री की चेतावनी बेहतर है क्योंकि आपातकाल भले ही 40 वर्ष पहले समाप्त हो गया हो लेकिन अधिनायकवाद की वापसी का खतरा बना रहा। ध्यान दीजिए कि यह भाषण कमोबेश उसी वक्त आया है जब सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने एनडीटीवी के हिंदी चैनल पर एक दिन का प्रतिबंध लगाने की घोषणा की। चैनल को यह सजा पठानकोट हमले के वक्त आचरण संहिता का पालन नहीं करने के लिए दी गई।

यहां दो बातें स्वीकार करनी होंगी। भाषण और प्रतिबंध के आदेश का लगभग साथ होना महज संयोग है। हां, मंत्रालय को एक बड़े समाचार माध्यम की सेंसरशिप का ऐसा आदेश जारी करने के बजाय कुछ और सोचना चाहिए था। इससे पहले आपातकाल के दौर में विद्याचरण शुक्ल के मंत्रित्व में भी ऐसी घटना हुई थी। यह घटना उस शाम घटी जब भारतीय पत्रकारिता के साहस का उत्सव मनाया जा रहा था। जिस दिन प्रधानमंत्री अपने भाषण में कह रहे थे कि आपातकाल जैसी कोई घटना दोबारा नहीं घटनी चाहिए, उसी दिन सम्मानित संस्था एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया (ईजीआई) ने एनडीटीवी पर प्रतिबंध की निंदा की। उसने इसकी तुलना आपातकाल से की। मैं ईजीआई को सम्मानित दो वजह से कह रहा हूं। पहली, बीतते वर्षों के दौरान अखबारों के मालिक संपादक की भूमिका में आ गए हैं या फिर वे कमजोर संपादक चाहते हैं। ऐसे में गिल्ड में ऐसे पुराने सदस्य रह गए हैं जो शायद अक्सर मिलते भी नहीं। दूसरी बात, अतीत में ईजीआई ने विरोध के समय भी जिस भाषा का इस्तेमाल किया वह पुराने जमाने के संपादकीय लेखों जैसी थी: संयमित, शालीन और आकलित। लेकिन ताजातरीन वक्तव्य अत्यंत तीखा और विस्फोटक है।
लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी ऐतिहासिक टिप्पणी में कहा था कि जब भारतीय प्रेस से झुकने को कहा गया तो वह रेंगने लगी। दुखद बात यह है कि गोयना के एक्सप्रेस, ईरानी के स्टेट्समैन और सबसे बहादुर राजमोहन गांधी द्वारा निकाली जाने वाली छोटी पत्रिका हिम्मत को छोड़ दिया जाए भारतीय प्रेस ने बहुत कम अवसरों पर कोई प्रतिरोध दिखाया है। बांग्लादेश विजय की आभा कम होने के साथ ही राष्ट्रीय प्रेस के साथ इंदिरा गांधी की शत्रुता हमले में बदल गई। उन्होंने उसे जूट प्रेस (कुछ मीडिया मालिक जूट कारोबारी थे) और झूठ प्रेस तक कहा। इस बीच महंगाई दर 25 फीसदी का स्तर पार कर गई थी और सन 1974 में पहले पोकरण विस्फोट के बावजूद जन भावनाएं संभल नहीं रही थीं। आपातकाल के दौरान में पहला बड़ा संपादकीय नाम थे बी जी वर्गीज।
सितंबर 1975 में उन्हें निकाले जाने के एक साल पहले से उन पर नजर थी। उन्होंने आपातकाल लागू होने के तीन महीने पहले एक संपादकीय लेख लिखा था: 'कंचनजंघा हम आ रहे हैं।' यह सिक्किम के विलय से संबंधित था। उनको तत्काल राष्ट्रविरोधी घोषित कर दिया गया। रोचक बात यह है कि वर्गीज के अधिकांश समकक्ष उनके बचाव में ठोस रूप में सामने नहीं आए। अभिव्यक्ति की आजादी की बात ठीक है लेकिन क्या सर्वेाच्च राष्ट्र हित में सिक्किम के विलय पर सवाल उठाया जाना था? उनके अखबार के पत्रकार इसका अपवाद थे। एनडीटीवी पर प्रतिबंध के मामले में भी आप ऐसा ही महसूस कर सकते हैं। गिल्ड और प्रिंट मीडिया का अधिकांश हिस्सा जिसे पहले प्रेस कहा जाता था वह विरोध करेगा लेकिन कई रसूखदार टीवी चैनल ऐसा नहीं करेंगे। यहां फिर राष्ट्रहित की दलील दी जाएगी। यह वही टीआरपी बटोरू अतिराष्ट्रवादी-दंभ है जिसने इनको भोपाल मुठभेड़ की कहानी की उपेक्षा करने को मजबूर किया। उनमें इसे पूर्व नियोजित ठंडे दिमाग से की गई हत्याएं कहने का तो साहस ही नहीं है जबकि एक निष्पक्ष जांच में ऐसा कुछ ही निकल सकता है। नियंत्रण रेखा पर जवान रोज जान गंवा रहे हैं और उसकी कवरेज पहले की तुलना में एकतरफा होती जा रही है। हम यह मानते हैं कि मोदी सरकार के पास एक नया सिद्घांत है लेकिन हम इसे इतना उपयोगी भी नहीं मानते कि उसके गुणों पर बहस की जाए। सामरिक प्रतिरोध का सिद्घांत जिसे पिछली सरकारों ने अपनाया, उसकी जगह मोदी-डोभाल सिद्घांत ने ले ली है। इस पर बहस के दौरान इस पर सवाल उठाने की बात तो भूल ही जाइए, वह राष्ट्रहित में नहीं है। तथ्य यह है कि श्रोता, जनता और बाजार को भी इससे मतलब नहीं है। इसका खुलासा युद्घोन्मादी चैनलों तथा अन्य तथ्यात्मक और प्रश्न करने वाले चैनलों की रेटिंग से भी होता है।
इंदिरा गांधी ने भी आपातकाल के दौर में अतिराष्ट्रवाद का इस्तेमाल किया और बाद में उसे उचित ठहराया। पड़ोस में शेख मुजीबुररहमान की हत्या और चिली में सल्वाडोर अलेंद को मारे जाने को इस बात का प्रमाण बताया गया कि जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में विदेशी हाथ है। इसे दमन को उचित ठहराने के लिए इस्तेमाल किया गया। यह तब हुआ जब भारत ने पाकिस्तान को दो टुकड़े किया ही था, नक्सल आंदोलन को नष्ट किया था और सन 1947 के बाद देश के समक्ष बाहरी या आंतरिक खतरे की आशंका न्यूनतम थी। उस वक्त राष्ट्रवादी उन्माद को बड़ी चालाकी से छद्म समाजवाद में मिलाया जा रहा था। आपातकाल के कुख्यात नारों को याद कीजिए जो हमारी बसों पर लिखे रहते थे। मेरा पसंदीदा नारा था 'अफवाह फैलाने वालों से सावधान रहें।' साफ शब्दों में कहें तो इसका तात्पर्य संदेशवाहक को निपटाने से था।
क्या चार दशक पहले भारत ने इसे स्वीकार कर लिया था? या उसने प्रतिरोध किया और अपनी आजादी बहाल की। इतिहास बताता है कि इनमें से पहली बात सही है। लेकिन यह भी कहानी का एक हिस्सा ही है। तथ्य यह है कि जब तक आपातकाल में जबरन बंध्याकरण और ऐसी ही अन्य बातों ने श्रेष्ठिï वर्ग को नाराज नहीं किया था तब तक बुर्जुआ और मध्य वर्ग को थोड़ी बहुत आजादी गंवाने का कोई मलाल नहीं था। बशर्ते कि बदले में ट्रेनें समय पर चल रही थीं। यह बहस का बिंदु हो सकता है लेकिन सन 1977 के चुनावी नतीजे आखिर क्या संकेत करते हैं? उन चुनावों में हिंदी प्रदेश में जहां बंध्याकरण जैसी योजनाएं चलीं वहां इंदिरा गांधी का सूपड़ा साफ हो गया जबकि विंध्य के दक्षिण में जहां यह सब नहीं हुआ वहां उनको स्पष्टï जीत मिली।
यह बहुत चलताऊ टिप्पणी होगी कि बुर्जुआ और मध्य वर्ग को आजादी से कोई लेनादेना नहीं। दरअसल वे हमेशा अपने नफा-नुकसान का आकलन करते रहते हैं। उस दृष्टिï से देखा जाए तो 40 साल में हम नहीं बदले हैं। सन् 1975-77 में जब प्रेस को खामोश किया गया, नागरिक समाज पर हमला किया गया और गरीबों पर जुल्म किए गए तब दोषियों के सहभागी थे। उस दौर को इस नारे से बेहतर भला कौन उजागर करेगा: 'नसबंदी के तीन दलाल, इंदिरा संजय, बंसीलाल।' अब मीडिया पर फिर हमला हुआ है, बेशर्मी से मुठभेड़ की जा रही हैं और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की सरकारी परिभाषा थोपी जा रही है और हम भी अतीत की ही अपनी भूमिका दोबारा निभा रहे हैं।
अब खतरे बड़े हैं। एक तो बाहरी शत्रु सामने है, दूसरा मजबूत अर्थव्यवस्था अपने साथ विजयोल्लास लाती है। तीसरा आज अधिकांश स्थापित सामाजिक-राजनीतिक ताकतों ने अपनी मूल आस्था गंवा दी है और वे अपनी राजनीति टीआरपी और जनमत प्रबंधन के सहारे कर रहे हैं। आज देश में इकलौता संसक्त, स्पष्ट सोच वाला राष्ट्रीय सामाजिक-राजनीतिक संगठन केवल एक ही है आरएसएस। सन् 1975-77 में उसने आपातकाल से जंग लड़ी थी आज वह सत्ता प्रतिष्ठान का नेतृत्व कर रहा है।
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(मूल लेख बिजनेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित) (शेखर गुप्ता सर के फेसबुक वाल से आभार स्वरुप प्रकाशित )

Wednesday, June 15, 2016



व्यावसायिकता से दूर खड़ा है प्रतिरोध का सिनेमा

 ज़ीशान 
प्रतिरोध का तात्पर्य विरोध और निषेध होता है जबकि प्रतिशोध का तात्पर्य प्रतिकार या बदले से है. कुछ लोग बहुत ही चालाकी से प्रतिकर के सिनेमा को प्रतिरोध का सिनेमा बताकर उस पंक्ति में जाना चाहते है जिस पंक्ति के अंदर प्रबुद्ध जन बैठकर सही अर्थों में प्रतिरोध की बात करते हैं. प्रतिरोध का सिनेमा सामाजिक मुद्दों, मानवीय मूल्यों और मानवाधिकार की लड़ाई लड़ने वाला सिनेमा है. यहां सिनेमेटिक ट्रीटमेंट शुद्ध कलात्मक, शुद्ध व्यावसायिकता से दूर होता है. इसमें वाणिज्य है लेकिन शुद्ध व्यवसायिकता नहीं है. इनमें सत्यजित रे, कुमार शाहनी, रित्विक घटक, मृणाल सेन आदि शामिल है. व्यावसाय और वाणिज्य में थोड़ा अंतर समझिये-  विकिपीडिया के अनुसार, व्यावसाय विधिक रूप से मान्य संस्था है जो उपभोक्ताओं को कोई उत्पाद या सेवा प्रदान करने के लिये लक्ष्य प्राप्ति के रूप में निर्मित की जाती है जबकि वाणिज्य किसी उत्पाद और व्यावसाय का वह भाग है जो उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं की उनके उत्पादकों एवं उपभोक्ताओं के बीच विनिमय से संबंध रखता है. ध्यान रहे प्रतिरोध के सिनेमा में वाणिज्य तो हो सकती है लेकिन व्यावसायिकता नहीं.  
अपरिहार्य आवश्यक व्यावसायिकता को ध्यान में रखकर मानवीय मुद्दों पर बना हुआ सिनेमा जो अपने अधिकारों की बात करता है और सामाजिक कलात्मक सिनेमेटिक ट्रीटमेंट को साथ लेकर चलता है. इस तरह की फिल्मों में श्याम बेनेगल, गोविन्द नेह्लानी, केतन मेहता, एम.पी वासुदेवन नायर, ग्रीश कर्नाड, गौतम घोष, गर्म हवा के डायरेक्टर एम एस सथ्यु आदि इसमें शामिल हैं. अभी हाल ही में केतन मेहता निर्देशित “मांझी- द माउंटेन मैन” फिल्म इसका बेहतरीन उदहारण है. जो समाज के एक खास पृष्ठभूमि को संदर्भ में रखकर प्यार और आम आदमी के संघर्ष को सैलूलॉयड पर उतरा गया है. फिल्म का मुख्य कथानांक एक दलित परिवार के संघर्ष को चिन्हित करता है. लेकिन निर्देशक ने इसे दर्शकों विवेक पर छोड़ दिया है.
दूसरी ओर, शुद्ध रूप से व्यावसायिक सिनेमा- यह अव्यवाहरिक, विकृत कल्पना से भरा हुआ सिनेमा होता है. इसमें सिनेमेटिक ट्रीटमेंट सतही और पुअर होता है. इसके अन्दर बी ग्रेड और सी ग्रेड फ़िल्में आती है. इस तरह की फिल्मों की एक खास प्रवृति यह होती है कि यह अपराध बोध होती है. इस तरह की फिल्मों की कथावस्तु प्रतिशोध के इर्द-गिर्द घुमती है. इस तरह की फिल्में जब शुरू होती है तो यह देखने को मिलता है कि वह हिंसा को जस्टीफ़ाइड करती है. इस तरह की फिल्मों में हमेशा यह देखने को मिल जायेगा कि नायक या नायिका के साथ कुछ अत्याचार हुआ है और वह उस अत्याचार का बदला लेने के लिए धड़ाधड़ हिंसा करता चला जाता है. बात वहाँ भी प्रतिरोध की कि जाएगी लेकिन यह प्रतिरोध नहीं प्रतिशोध होता है.
महेश भट्ट ने एक इंटरव्यू में कहा था कि अब समय आ गया है कि हम सिनेमाई समझ को लेकर समाज को शिक्षित करें. उन्हें सिनेमाई भाषा और उसके व्याकरण के प्रति जागरूक करें. (We have to literate the society with audio-visual language. Teach them grammar of audio-visual language and how audio-visual language is functioning. A common people only see it but can’t understand it). किसी फिल्म की कहानी क्या है इसे कोई बच्चा भी देखकर बता सकता है लेकिन उसके ट्रीटमेंट को, उसके प्रेजेंटेशन के पीछे डायरेक्टर की क्या सोच है उसे वो नहीं समझ सकता. ऐसे में शिक्षण संस्थान और सामाजिक जागरूकता से जुड़े संस्थान इसमें अहम् भूमिका निभा सकते हैं.
सिनेमा को सातवीं कला कहा जाता है. लेकिन इससे पहले वो छः कला कौन-कौन से इसे जानना भी आवश्यक है. इसके अंतर्गत तीन प्रतिनिधित्व कला (Rrepresentative Arts) आते है और तीन प्रदर्शित कला (Performing arts). (The cinema is considered as seventh arts. So what are the sixth art. There are three representative arts and three performing arts. So, Cinema is combination of all sixth arts.)
प्रतिनिधित्व कला (Representative Arts) के अंतर्गत रचनाकार फिजिकली सामने नहीं होता जबकि उसकी रचना उसको प्रस्तुत करती है. जैसे- पहला साहित्य, प्रेमचंद ने कहानी लिख दी लेकिन कहानी पढ़ते समय प्रेमचंद जी हमारे सामने नहीं होते लेकिन हम कफ़न के माध्यम से, ईदगाह के माध्यम से उन तक पहुंचते है ऐसे में कोई रचना रचनाकार को प्रस्तुत करती है. यहां रचनाकार फिजिकली प्रस्तुत नहीं होता. दूसरा, पेंटिंग- इसमें भी पेंटर सामने नहीं होता लेकिन उसकी पेंटिंग के माध्यम से उस रचनाकार तक पहुँचते है उस कलाकार तक पहुँचते है. तीसरा है आर्किटेक्चर, मोनुमेंट्स आदि. जिन्होंने ताजमहल, लालकिला बनाया वो हमारे बीच नहीं है. लेकिन उनकी रचना द्वारा हम उन रचनाकारों तक पहुँचते हैं. ये तीन प्रतिनिधित्व कला के उदहारण है.
जबकि प्रदर्शित कला (Performing arts) में  कलाकार फिजिकली सामने मौजूद होता है. हम उससे बात कर सकते है, उससे कुछ कह सकते है, उसे छू सकते है. यहां कलाकार अपनी कला को खुद ही प्रदर्शित करता है. जिसका पहला उदहारण थिएटर है. थिएटर में कलाकार फिजिकली सामने होता है. वो अपनी कला के माध्यम से दर्शकों को इंटरटेन करता है. दूसरा है- संगीत. संगीतकार अपने संगीत के माध्यम से अपने स्त्रोताओं के सामने होता है. चाहे वो इंस्ट्रूमेंट्स बजा रहा है हो या वो अपनी आवाज दे रहा हो. और तीसरा- नृत्य है. इसमें भी कलाकार फिजिकली सामने होता है. इन छः कलाओं के मिश्रण को ही सिनेमा कहा जाता है जिसे सातवीं कला के नाम से जाना जाता है. जो फिजिकली भी है और नहीं भी है. जिसमें भ्रम भी है लेकिन वो रियलिटी भी दर्शकों के सामने रख रही है.
जब तक हम इन छः कला को नहीं समझते तब तक हम कहानीकार, कलाकार और निर्देशक के द्वारा फिल्मों द्वारा इनकोड की जा रही मैसेज को डिकोड नहीं कर सकते. जिसके कई उदहारण मिल जायेंगे. अमूमन दर्शकों द्वारा किसी न किसी फिल्म को बैन करने की मांग होती रहती है. जैसे- गर्म हवा, बैंडिट क्वीन, फाइनल सलूशन, ब्लैक फ्राइडे, वाटर, पीके और इंडियाज डॉटर- द स्टोरी ऑफ़ ज्योति सिंह आदि फिल्में है जिसे लेकर दर्शकों, सेंसरशिप बोर्ड और फिल्म निर्देशकों के बीच तना-तनी की खबरे आई. राजकुमार हिरानी द्वारा निर्देशित फिल्म ‘पीके’ एक अतिसंवेदनशील मुद्दे पर आधारित फिल्म है जो भगवान और धर्म-कर्म के नाम पर चल रहे धार्मिक उद्योगों पर सवालिया निशान खड़ा करती है. इसे भी कुछ संगठन बैन करने के मांग कर रहे थे. ये उदहारण बताती है कि हमें विवेकशीलता की कितनी कमी है. वैसे ही इंडियाज डॉटर- द स्टोरी ऑफ़ ज्योति सिंह एक डाक्यूमेंट्री फिल्म है जोकि दिल्ली में 16 दिसम्बर, 2012 को एक लड़की के साथ हुए दर्दनाक हादसे को बयान करती है. इसे भी बैन किये जाने की मांग की गयी. स्वयं को प्रोग्रेसिव कहने वाला समाज स्वयं के हकीक़त से मुंह क्यूँ मोड़ रहा इसे समझने की जरुरत है.
वर्तमान में हिंदी फिल्मों में भी कुछ कलाकार, निर्देशक सामने आये है जो प्रतिरोध की बात करते है. उनके फिल्मों में व्यावसायिकता तो है लेकिन साथ ही वो समाज के सपाट, तीखे प्रतिरोध या विरोध के विषय को अपने फिल्मों में समय समय पर लेने की कोशिश करते रहते है. इसके अंदर प्रकाश झा जैसे फिल्म निदेशक आते हैं. जिन्होंने राजनीति, गंगाजल, चक्रव्यूह और आरक्षण जैसी फ़िल्में बनाई है. प्रकाश झा जैसे निर्देशकों ने इस तरह के सिनेमा को गति दी है. प्रकाश झा द्वार बनाई गयी राजनीति फिल्म जोकि एक विशेष गति भरा कलात्मक सिनेमेटिक ट्रीटमेंट सिनेमा है. यह हिन्दुओं के एक महत्वपूर्ण काव्य ग्रंथ “महाभारत” के मेथडोलॉजी पर आधारित है. इसके अंदर नसरुद्दीन शाह है जिनका नाम फिल्म में भास्कर सान्याल है. महाभारत में करण कुंडल लेकर पैदा हुआ तो इसमें अजय देवगण हैं जो करण की भूमिका में हैं वो भी कुंडल लेकर पैदा हुआ है. नाना पाटेकर कृष्ण और रणवीर कपूर ने दुर्योधन का किरदार निभाया है. प्रकाश झा ने इस मेथडलोजी को जिस बेहतरीन ढ़ंग से रखा है ऐसे में आम दर्शक क्या समझेंगे. जब तक वो की सिनेमा की भाषा नहीं समझते. अगर वो सिनेमा की भाषा नहीं समझ पा रहे हैं तो वो इस तरह की सिनेमा को डिकोड नहीं कर सकते. कलयुग श्याम बेनेगल की सिनेमा है. आम दर्शक उसे डिकोड नहीं कर सकते, जबतक कि वो उन सारी स्थितयों को समझ न सकें. इसलिए जो ट्रीटमेंट इन फिल्मकारों ने रखा है और उसके द्वारा उन्होंने अपनी बात कही है. वहीं वर्तमान हिंदी सिनेमा में रोमांटिक युवा विद्रोहों और संतुलित प्रतिकार का शुद्ध व्यवसायिक सिनेमा का दौर भी चल है. जो तकनिकी तौर पर अर्द्धमार्गीय कलात्मक सिनेमेटिक ट्रीटमेंट वाला सिनेमा है जिसमें बड़े-बड़े बजट के फ़िल्में बनते है. इसके अंदर शाहरुख, सलमान खान और आमिर खान आदि  कलाकार आते है. शाहरुख़ खान की फिल्म- माय नेम इज खान, सलमान की जय हो और आमिर की पीके आदि को इसके अंतर्गत शामिल किये जा सकते है.
पिछले कुछ दशकों से हिंदी फिल्मों में यह प्रचलन चल पड़ी है कि फ़िल्मकार आम आदमी की बेबसी और उसकी असहायता को फिल्म का कहानी का आधार बना कर प्रतिरोध की बात करने लगा है. और इसके जरिये ये फ़िल्मकार उस श्रेणी में आ जाना चाहते है जिस श्रेणी में प्रबुद्ध जन बैठकर सही मायनों में प्रतिरोध की बात करते है लेकिन हिंदी फिल्मों का यह अधूरा यथार्थ है. आम दर्शक को अब इसके प्रति जागरूक होना होगा, सिनेमा की भाषा को समझना होगा तभी मायनों में सिनेमा समाज का दर्पण कहलाने के योग्य होगा.
  
संदर्भ सामग्री-
·       परख, जवरिमल: जनसंचार माध्यमों का सामाजिक चरित्र, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर, नई दिल्ली
·       रजा, डॉ राही मासूम. सं- सिंह, प्रो.कुंवरपाल: सिनेमा और संस्कृति, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली
·       ब्रह्मात्ज, अज: सिनेमा समकालीन सिनेमा, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली
·       सिनेमा के सौ साल- हंस, फ़रवरी 2013 
·       http://www.youthconnect.in/2015/09/04/43467/