Thursday, December 15, 2016


समय से मुठभेड़ कराती गुजरात फाइल्स
ज़ीशान
मीडिया में दम तोड़ते रिपोर्टिंग कला के बीच राणा अयूब की आई किताब गुजरात फाइल्स एनाटोमी ऑफ कवर-अप मौजूदा दौर में दो चीजों के लिए सुर्खिया बटोर रही है. पहली, उनकी साहसी खोजी पत्रकारिता के लिए और दूसरी गुजरात की गुजरे दौर की पुनः याद दिलाने के लिए. एक लिहाज से देखा जाये तो इस किताब की टाइमिंग बेहद मुफीद है. क्योंकि मीडिया रिपोर्टिंग को लेकर इन दिनों बहस काफी तेज़ है. खासकर ग्राउंड रिपोर्टिंग इन दिनों सवालों के घेरे में है. बीबीसी के लिए लिखे एक लेख में वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार अपनी बात रखते हुए कहते है कि आज की पत्रकारिता साउंड-बाइट पत्रकारिता बनकर रह गयी है जहां ग्राउंड रिपोर्टिंग और इनवेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग न के बराबर है. किसी घटना के एक जैसे ही विजुअल्स और बयान लगभग प्रत्येक समाचार चैनलों और समाचार-पत्रों में पढ़ने और देखने को मिल जायेंगे. आज की पूरी पत्रकारिता प्रेस नोट, प्रेस कांफ्रेंस और समाचार समितियों पर टिकी हुई है. आजकल समाचार-पत्रों, टेलीविजन और अन्य मीडिया संस्थानों में संवाददाताओं के बाई-लाइन स्टोरी कम ही दिखेंगे. अगर इनकी बात की ओर ध्यान दी जायें तो इस किताब ने साबित किया है अभी भी इनवेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग की प्रासंगिकता बनी हुई है.
गुजरात फाइल्स एक तरह से 2002 दंगे के दरम्यान तथा बाद के गुजरात में महत्वपूर्ण पदों पर आसीन लोगों के बीच की गयी गाल-बहेलियां हैं. जिसमें राणा एक एन.आर.आई मैथली त्यागी का रूप धारण कर एक टीनएज फ्रांसीसी लड़के के साथ गुजरात पर एक डाक्यूमेंट्री बनाने अमेरिका के एक फिल्म इंस्टिट्यूट से आई है. साल 2010 में अपनी आठ महीने की इस अथक खोजी पत्रकारिता के दरम्यान मैथली खुफियां कैमरे के साथ तत्कालीन प्रशासनिक अधिकारियों और राजनेताओं से मिलती है और उनकी बाते अपने कैमरें और ऑडियो रिकॉर्डर में कैद करती है. रिकॉर्ड की गयी यह बातें गुजरात के काले दिनों में राजनेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच सक्रीय संलग्ता का एक जीता जागता सबूत है, लेकिन अफसोस कि गुजरात उच्च न्यायालय को हालिया आये गुलबर्ग सोसाइटी नरसंहार निर्णय में इनकी कोई संलिप्तता दिखाई नहीं देती है.   
करियर के शुरूआती दिनों से पत्रकारिता क्षेत्र की चुनौती स्वीकार करती आई राणा अयूब को जब तहलका पत्रिका में गुजरात 2002 दंगे पर किये गए अपने खास रिपोर्टिंग के बाद गुजरात दंगे से जुड़े कुछ खास लिंक मिले तो बीमार रहते हुए अपने स्वास्थ्य की प्रवाह किये बगैर राणा अपना नाम और पता बदल कर दिल्ली से गुजरात चल पड़ती है. वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी अपने फेसबुक पेज पर लिखते हैं कि ‘तहलका की पूर्व खोजी पत्रकार राणा अयूब की यह किताब उन सभी भारतीयों को पढ़नी चाहिए जो देशभक्त, राष्ट्रवादी, लोकतंत्रवादी और मानवाधिकारवादी हैं. चूँकि यह किताब खोजी पत्रकारिता का बेजोड़ नमूना है, इसलिए युवा मीडिया कर्मियों के साथ-साथ मीडिया विद्यार्थियों के लिए भी यह एक प्रकार से कम्पास का रोल अदा करेगी.’  
गुजरात फाइल्स की भूमिका में राणा अयूब मीडिया हाउस के ताने-बाने से परिचित कराती हैं, जिसमें तीन साल की एक मासूम लड़की के साथ हुई बलात्कार की रिपोर्ट छोड़ उन्हें मुंबई के मानसून की विजुअल्स लाने की जिम्मेदारी दी जाती है. इस घटना के कारण अंदर से टूट चुकी राणा को उनके तत्कालीन संपादक पत्रकारिता की पाठ पढ़ाते हुए कहते हैं ‘एक अच्छे पत्रकार को स्टोरी से स्पेस बनाये रखने की कला सीखनी चाहिए और उसमें व्यवहारिकता होनी चाहिए. राणा आगे अपनी अफसोस का इज़हार करते हुए कहती हैं कि मैं इस कला की बारीकियां नहीं सीख पाई और अगले ही लाइन में वह इसकी जिम्मेदारी कॉर्पोरेट और सियासी घरानों पर डालती हुई देश के मीडिया के वर्क कल्चर पर तमाचा दे मारती हैं. इस किताब की शुरुआत राजनेता और नौकरशाह की आपसी गठजोड़ के साथ, जान जोखिम में डालकर नरसंहार और फर्जी मुठभेड़ से साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के जरिये सत्ता हासिल करने की कहानी बयां करती है. इस किताब में राणा अयूब ने एटीएस के जी.एल. सिंघल, राजन प्रियादर्शी, अतिरिक्त मुख्य सचिव अशोक नारायण, अहमदाबाद पुलिस कमिश्नर पी.सी. पांडे, इंटेलिजेंस प्रमुख जी. सी. रायगर तथा गुजरात दंगों में दोषी पाई गयी मंत्री माया कोडनानी से गुजरात के तमाम विवादित मुद्दों पर बातचीत की है.
पुलिस प्रशासन जैसे आला महकमे में भी कैसे कास्टीसिज्म हावी है इस बात की यह किताब तस्दीक करती हुई दिखाई देती है. राणा गुजरात के पूर्व ए.टी.एस. चीफ राजन प्रियादर्शी का जिक्र करते हुए बताती है कि राज्य के एक बड़े ओहदे पर काबिज हो जाने के बावजूद उन्हें जातिये भेद-भाव का शिकार होना पड़ता था. ऊँची जाति के कम रैंक के अधिकारियों के सामने भी उन्हें दोहरा रवैया झेलना पड़ता था. टाइम्स ऑफ़ इण्डिया में छपे एक खबर के मुताबिक राजन प्रियादर्शी बताते है कि राज्य के इतने महत्वपूर्ण पद का पदभार संभालने के बावजूद गाँव में वह स्वर्ण जातियों के इलाके में अपना घर नहीं खरीद सकते थे और कैसे गाँव का एक नाई उनके दलित होने की वजह से उनके बाल काटने से मना कर देता है(पेज न.-56). राणा जब राजन से सवाल करती है कि ‘मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात में काफी लोकप्रिय है, तो इसके जवाब में राजन कहते हैं- वह सबको बेवकूफ बनाते हैं और जनता बेवाकूफ बनती है. राणा अगले सवाल में उनसे पूछती है लॉ एंड आर्डर की यहाँ बुरी स्थिति है, कम ही ऑफिसर्स होंगे जो अपना काम ईमानदारी से करते होंगे. इसके जवाब में राजन कहते हैं, बहुत कम ही हैं, और आगे वह कहते हैं गुजरात में हुए मुस्लिम हत्याओं का जिम्मेदार नरेंद्र मोदी है (पेज न.-57).
राणा से बातचीत के दरम्यान जी. एल. सिंघल बताते है कि गुजरात में सारे मंत्रालय और मंत्री रबड़ स्टाम्प बने हुए थे. राज्य के सारे निर्णय नरेंद्र मोदी खुद ही लिया करते थे. यहाँ राणा उनसे पूछती है कि ‘आपके केस (फोन टेपिंग मामले) में जब गुजरात के तत्कालीन गृह राज्यमंत्री अमित शाह की गिरफ्तारी होती है तो मुख्यमंत्री की क्यों नहीं हुई. इसके जवाब में सिंघल कहते हैं- 2007 में सोहराबुद्दीन एनकाउंटर के बाद जब सोनिया गाँधी गुजरात आई तो उन्होंने नरेंद्र मोदी को ‘मौत का सौदागर’ कह दिया था. इसके बाद नरेंद्र मोदी हर सभा सम्मलेन में लोगों से यह कहने लगे सोहराबुद्दीन कौन था, उसको मारा तो अच्छा हुआ की नहीं? लोग उनके इस बात पर जयकारे लगाने लगे. इससे यह हुआ कि उन्हें जो चाहिए था उन्हें वह मिल गया(पेज न.-48).  
इस रोमांचक सफर का अंत बहुत ही आप्रत्याशित होता है. इस कहानी के आखरी कड़ी नरेंद्र मोदी से राणा की छोटी सी मुलाक़ात होने के बाद उन्हें वापस दिल्ली बुला लिया जाता है. दिल्ली वापस लौटने के बाद जब इनकी मुलाक़ात तहलका के मैनेजिंग एडिटर तरुण तेजपाल और शोमा चौधरी से होती है तो तरुण तेजपाल उनसे कहते हैं– देखों सोमा, बंगारू लक्ष्मण पर स्टिंग के बाद हमारा ऑफिस बंद कर दिया गया था. नरेंद्र मोदी एक पॉवरफुल आदमी है, भविष्य में वह प्रधानमंत्री बनने के कगार पर है. अगर हम उसको छुयेंगे तो ख़त्म हो जायेंगे(पेज न.-203). राणा उन्हें कनवेंस करने की कोशिश करती है और कहती है, कुछ ही दिन बाद उन्हें मोदी के दफ्तर से मुलाकात के लिए दोबारा फोन आने वाला है. लेकिन उनकी सारी दरयाफ्त बेकार चली जाती है. उसी शाम उसे मोदी के दफ्तर से मैसेज आता है कि मुख्यमंत्री उनसे मिलना चाहते हैं. लेकिन राणा बहाना बनाकर उनसे नहीं मिलती है और उसके दो दिनों के बाद वह अपना यूनीनोर सिम तोड़ डालती हैं (पेज न.-204). तब से मैथली इस कहानी से गायब हो जाती है और संपादक ने इस स्टोरी को आगे और फॉलो नहीं करने का निर्णय लेते हैं. तब से राणा आज तक चुप हैं.
आगामी यू.पी. विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र इस की किताब की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है. एक ऐसे समय में जब बीजेपी 2014 आम चुनाव का इतिहास आगामी विधानसभा चुनाव में भी बरक़रार रखना चाहती है ऐसे में इस किताब को लेकर आलोचनाएं भी हो रही है. इसे लेकर सोशल मीडिया पर भी आरोप-प्रत्यारोप की दौर जारी है. कई लोगों का मानना है कि वर्तमान समय में पब्लिसिटी पाने का आसान जरिया नरेन्द्र मोदी की आलोचना करना है. अलजज़ीरा चैनल पर मेहदी हसन के हेड टू हेड प्रोग्राम में अपने पक्ष का बचाव करते हुए राणा कहती हैं कि मैं देश के टीवी चैनल्स, समाचारपत्र-पत्रिका, ऑनलाइन न्यूज़पोर्टल और प्रकाशकों से बात की लेकिन किसी ने भी इसे प्रसारित या प्रकाशित करने के लिए हामी न भरी. आखिर में मैंने स्वयं ही इसे प्रकाशित करने की ठानी. मई 2016 में यह किताब मार्किट आई और 2 जून, 2016 तक अमेजन पर यह किताब बेस्ट सेलर किताबों की फहरिस्त में सबसे आगे थी.

किताब-गुजरात फाइल्स- एनाटोमी ऑफ़ कवर-अप 
लेखक- राणा अयूब
केटेगरी- नॉन-फिक्शन
भाषा- अंग्रेजी
मूल्य- 295 रु

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