Sunday, March 5, 2017

समय से जूझती कश्मीरी पत्रकारिता
ज़ीशान
कश्मीरी और कॉशुर शब्द एक दूसरे के पर्यायवाची शब्द हैं. जम्मू-कश्मीर के निवासी इस कॉशुर शब्द को बेहतर रूप से जानते हैं जबकि इस प्रान्त के बाहर के लोग इसे कश्मीरी शब्द के रूप में जानते हैं. अतः कश्मीर निवासी अपनी भाषा को कॉशुर और कश्मीर प्रान्त को क़शीर कहते हैं. इस लिहाज से कश्मीरी पत्रकारिता को क़शिर सहाफत या पत्रकारिता कह सकते हैं. कश्मीरी पत्रकारिता की शुरुआत अन्य पत्रकारिता की तरह ही छापेखाने के खुल जाने के बाद हुई. लेकिन यहाँ मूल पत्रकारिता की शुरुआत 19वीं सदी के दूसरे हिस्से के शुरुआत में हुई, जब कश्मीर में डोगरा हुकूमत ने पहला छापाखाना 1858 में क़ायम किया. इस छापेखाने में फारसी और देवनागरी लिपि के टाइपफेस मौजूद थे. इस छापेखाने में फारसी और संस्कृत के अलावा उर्दू में कुछ सरकारी फार्म और दस्तावेज छपते थे. इससे पूर्व जम्मू-कश्मीर प्रान्त में पत्रकारिता मूलतः वहां के मौजूदा राजाओं के हाथों में रही. वो स्वयं के संवाददाता नियुक्त करते थे, जो प्रान्त भर की ख़बरें इकठ्ठा कर दरबार में पेश किया करते थे. ये इकठ्ठा की गईं ख़बरें सिर्फ दरबार और अंदरूनी हल्कों तक ही महदूद थीं. ये ख़बरें प्रान्त के आम लोगों के लिए नहीं होती थीं. मूल रूप से इस पत्रकारिता का मकसद राजा को अपने प्रान्त के हालात के प्रति अवगत कराना था.   

जम्मू-कश्मीर और कश्मीरी भाषा
जम्मू-कश्मीर को भौगौलिक आधार पर तीन खंड में विभाजित किया जा सकता है- जम्मू, कश्मीर घाटी और लद्दाख. जम्मू में मूल भाषा डोगरी, कश्मीर घाटी की कश्मीरी और लद्दाख की लद्दाखी है. इसके अलावा पहाड़ी, गोजरी, शिना, पंजाबी और हिंदी भी यहाँ बोली जाती है. मिशनरियों के आगमन के फलस्वरूप और पर्यटन के हिसाब से मुफीद जगह होने की वजह से अंग्रेजी भाषा भी यहाँ बोली और सुनी जा सकती है. यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि जम्मू-कश्मीर की राजभाषा उर्दू है. प्रान्त भर में सारे कार्यालयी कार्य उर्दू भाषा में ही किये जाते हैं. इसकी वजह अंग्रेजी विषय के शोधार्थी मीर शौकत यह बताते हैं कि कश्मीरी भाषा में फारसी और संस्कृत भाषा के शब्द बेसतर हैं, चूँकि कश्मीरी भाषा की लिपि फारसी है और उर्दू भाषा की लिपि भी फारसी है तो यहाँ के लोगों ने स्वयं को प्रान्त के बाहर के लोगों से जुड़ने के लिए उर्दू भाषा अपनाई. चूँकि कश्मीरी लिपि भी फारसी होने की वजह से इन्होंने कार्यालयी कार्यों के लिए उर्दू भाषा अपनाई. एक अनुमान के अनुसार कश्मीर प्रान्त में लगभग 70 लाख लोग कश्मीरी भाषा बोल सकते हैं. कश्मीरी भाषा को संविधान की 22वीं अनुसूची में शामिल किया गया है. लेकिन यह भी दुर्भाग्य है कि कश्मीर प्रान्त के सरकारी और ग़ैर-सरकारी काम-काज में इसकी उपयोगिता लगभग नगण्य है. इसके अतिरिक्त यह विडंबना देखिये कश्मीर प्रान्त के आज की नौज़वान नसलें इसे लिखने पढ़ने में मूल रूप से असमर्थ हैं. इन सारे बिन्दुओं को देखते हुए जम्मू-कश्मीर सरकार ने नवम्बर, 2008 से घाटी में माध्यमिक स्तर तक इसे अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाने का निर्णय लिया है.

कश्मीर में पत्रकारिता इतिहास के पन्नों से
1858 में छापेखाने आ जाने के बावजूद जम्मू-कश्मीर प्रान्त में मूल पत्रकारिता की रफ़्तार काफी धीमी रही. इसके कुछ वर्ष उपरान्त जम्मू से विद्याविलास प्रेस और सालिगराम प्रेस नामक दो छापेखाने की शुरुआत हुई. इस छापेखाने में उर्दू टाइपफेस भी मौजूद थे. सन 1867 में विद्याविलास प्रेस के नाम से ही प्रान्त की सबसे पहली मुद्रित समाचारपत्र का प्रकाशन हुआ जोकि साप्ताहिक और आठ पृष्ठों का हुआ करता था. इस समाचारपत्र में दाई ओर उर्दू सामग्री और बाई ओर हिंदी सामग्री प्रकाशित हुआ करती थी. लखनऊ से निकलने वाले ‘अख्तरहिन्द’ के संपादक ने अपनी पुस्तक ‘अख्तर शहंशाही’ में ‘तहफिः कश्मीर’ का ज़िक्र किया है, जिसका साप्ताहिक प्रकाशन वर्ष 1876 में मुंशी जमुना प्रसाद श्रीनगर से किया करते थे. इससे तीन वर्ष पूर्व जम्मू-कश्मीर प्रान्त के तत्कालीन राजा गुलाब सिंह ने भी ‘धर्म दर्पण’ नाम से एक अर्द्ध-मासिक पत्रिका का प्रकाशन किया. जिसका प्रकाशन विद्याविलास प्रेस की तरह उर्दू और हिंदी में हुआ करता था. 16 पृष्ठों में प्रकाशित होनी वाली इस पत्रिका का मूल उद्देश्य आम लोगों तक राजा की राय एवं नीतियों को पहुँचाना था. सन 1884 में एक सरकारी अफ़सर ने श्रीनगर से ‘जम्मू गज़ट’ नामक पत्र का प्रकाशन प्रांरभ किया. इन सारे समाचारपत्रों की मूल भाषा उर्दू ही थी.
तत्कालीन जम्मू-कश्मीर प्रान्त के राजा गुलाब की बेसतर ज़िन्दगी प्रान्त की शांति और सद्भाव बनाने में गुजरी. इनके पुत्र रणबीर सिंह ने समाज में आ रहे बदलाव को परखते हुए संचार के साधनों पर थोड़ा ध्यान दिया. इन्होंने संचार माध्यम को सुगम बनाने के लिए क्षेत्र में टेलीग्राफ लाया और इसके लिए उर्दू भाषा के इस्तेमाल का हुक्म दिया. इनके पुत्र प्रताप सिंह ने प्रान्त भर में उर्दू भाषा की मकबूलियत को देखते हुए सन 1889 में उर्दू को प्रान्त की राजभाषा बना दिया और 1947 में भारत स्वतंत्र होने के उपरांत उर्दू प्रान्त की राजभाषा बनी रही. इन्हीं के प्रयास से कश्मीर प्रान्त में पहला निजी पत्र ‘रणबीर’ भी प्रकाशित हुआ, जिसकी भाषा उर्दू थी. इस समय तक जितने भी पत्र प्रकाशित हुए उन सभी में प्रांतीय सरकार का हस्तक्षेप रहा, यही कारण रहा की यहाँ स्वतंत्र पत्रकारिता होने में काफी समय लगा.

कश्मीरी पत्रकारिता की शुरुआत काफी बाद में हुई. सन 1940 में गुलाम अहमद महजूर ने ‘ग़ाश’ नामक पहला कश्मीरी साप्ताहिक पत्र निकाला. इसके बाद 1965 में ‘वतन’ और 1973 में ‘कॉशुर अख़बार’ प्रकाशित हुआ. सन 1980 में कश्मीर यूनिवर्सिटी के एक छात्र समूह ने ‘सिम्त’ नाम से एक वीकली कश्मीरी पत्र का प्रकाशन प्रारंभ किया, जो एक वर्ष भी प्रकाशित न हो सका. 1998 में इन्होंने ‘मिरास’ नाम से एक और साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ किया, जिसका प्रकाशन करीब दो साल तक हुआ और फिर बंद हो गया. इसके उपरांत कश्मीरी पत्रकारिता लंबे समय के लिए लगभग अचेत अवस्था में चली गयी.

कश्मीरी पत्रकारिता का नया चिराग दैनिक ‘संगरमाल’ और ‘कह्वट’
वर्ष 2006 से पूर्व तक जम्मू-कश्मीर प्रान्त में एक भी कश्मीरी समाचारपत्र का प्रकाशन नहीं हो रहा था. फरवरी, 2006 में दूरदर्शी और विवेकी सैयद रफीउद्दीन बुखारी ने जोखिम उठाते हुए कश्मीरी ज़बान के फरोग के नज़रिये से फरवरी, 2006 में ‘संगरमाल’ साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया. जिसकी पृष्ठ रंगीन हुआ करती थी. सैयद बुखारी इससे पूर्व कश्मीर से उर्दू और इंग्लिश में समाचारपत्र का प्रकाशन कश्मीर मीडिया हाउस के अंतर्गत कर रहे थे. इस मीडिया हाउस की अंग्रेजी सेवा ‘राइजिंग कश्मीर’ कश्मीर प्रान्त में काफी लोकप्रिय समाचारपत्र है, जिसका प्रकाशन अंग्रेजी भाषा में होता है. बाज़ार के नज़रिये से कश्मीरी ज़बान का एक बड़ा बाज़ार होने के बावजूद वर्ष 2006 से पूर्व तक एक भी कश्मीरी पत्र-पत्रिका का प्रकाशन नहीं होता था. ऐसे में सैयद बुखारी ने कश्मीरी भाषा में भी पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया, लेकिन दुर्भाग्यवश इस पत्रिका का प्रकाशन भी ज्यादा दिन तक नहीं हो सका. करीब दो वर्ष में इसका प्रकाशन बंद हो गया. परन्तु जुलाई, 2009 से इस पत्र का प्रकाशन पुनः प्रारंभ किया गया. इसके बाद इसने बाज़ार में अपनी पकड़ बना ली और दिन-प्रतिदिन इससे पाठक जुड़ते गए. सैयद रफीउद्दीन बुखारी ने एक बार इंटरव्यू में कहा था कश्मीरी भाषा में पत्र का प्रकाशन करने प्रमुख कारण कश्मीरी भाषा को बढ़ावा देना और नौज़वान नस्ल को इससे जोड़ना है. यह इनकी थोड़ी कोशिश कश्मीरी पत्रकारिता के लिए एक मील का पत्थर साबित हुई, जो बाद में दैनिक ‘संगरमाल’ के रूप में सामने आई. कश्मीरी भाषा में साप्ताहिक पत्रिका की सफलता के बाद इन्होंने 12 जुलाई, 2011 से इसे दैनिक कर दिया. जिसकी मकबूलियत काफी रही. इस समाचारपत्र में स्थानीय, राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय, स्पोर्ट्स आदि के अलावा राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक ख़बरों को प्रमुख रूप से कवर किया जाता है. साथ ही कश्मीर प्रान्त के सामाजिक-आर्थिक मुद्दे प्रमुखता से प्रकाशित किये जाते हैं. कश्मीरी दैनिक ‘संगरमाल’ का इंटरनेट संस्करण भी है, इसके अलावा इसने अपने सामग्रियों को संग्रहित करने के लिए बेहतर ‘आर्काइव गैलरी’ भी बना रखी है.

कश्मीरी भाषा में पहला दैनिक पत्र होने का श्रेय ‘कह्वट’ समाचारपत्र को जाता है. इसका प्रकाशन दैनिक ‘संगरमाल’ से एक दिन पूर्व 11 जुलाई, 2011 से प्रारंभ हुआ. दैनिक कह्वट की शुरुआत करते हुए इसके संपादक ने कहा था कि इस पत्र के प्रकाशन का महत्वपूर्ण मक़सद अपनी मातृभाषा को संरक्षित करना है साथ ही आज के युवाओं के बीच एक जो कम्युनिकेशन गैप हो गया है उसे पाटना भी है. इस पत्र का इंटरनेट संस्करण भी है, जिसकी वजह से देश-विदेश के कश्मीरी भाषा जानने वाले लोग सुदूर बैठे अपनी स्थानीय ख़बरों से रूबरू होते रहते हैं. इनके अलावा जम्मू-कश्मीर प्रान्त में कश्मीरी भाषा में इंटरनेट संस्करण के रूप में दैनिक ‘कॉशुर अख़बार’ का भी प्रकाशन इन दिनों हो रहा है, जो प्रतिदिन की ख़बरे आमलोगों को इंटरनेट के माध्यम से पहुंचा रहा है. इसके अलावा एक साप्ताहिक ‘सोन मिरास’ पत्रिका का इंटरनेट संस्करण भी प्रकाशित हो रहा है जिसमें देश और दुनिया सहित राजनीतिक, आर्थिक और स्थानीय ख़बरे पढ़ी जा सकती हैं.

पत्रकारों के नज़रों में कश्मीरी पत्रकारिता
बीबीसी रेडियो से जुड़ी रही वरिष्ठ पत्रकार नईमा महज़ूर का मानना है कि पत्रकरिता ही एक ऐसा पेशा है जो आज के कश्मीरी नौजवानों को देश-दुनिया को सोचने समझने और एक अलग नज़रिये से देखने की क़ुवत देता है. आज कश्मीरी नौजवान कश्मीर प्रान्त में ही बंधे पड़े हैं, उन्हें यहाँ से आगे निकलने की जरूरत है और यह तभी मुमकिन हो पायेगा जब उन्हें उन्हीं के ज़बान में समझाया जाय. नईमा महज़ूर कहती है कि आज का कश्मीरी नौजवान स्वयं को पीड़ित महसूस करता है, उन्हें इस संवेदना से बाहर निकालने की जरुरत है और यह तभी मुमकिन है जब उनसे उन्हीं की भाषा में बात की जाय ताकि वो स्वयं को इससे जोड़ पायें. ऐसे में यहाँ कश्मीरी पत्रकारिता आज के नौजवानों के बीच एक पुल बनाने का कार्य कर सकती है ताकि वो समाज एवं दुनिया को बेहतर ढ़ंग से समझ सकें. जबकि इसके इतर अंग्रेजी भाषा के शोधार्थी एनायत अली शाह कश्मीरी भाषा पर अपनी विचार व्यक्त करते हुए कहते है कि आज बाज़ार की भाषा अंग्रेजी है और यह भाषा इतनी मज़बूत है कि इसके सामने कोई दूसरी भाषा टिक नहीं पा रही है, यही कश्मीरी भाषा के साथ भी हो रहा है. आज की जो नस्ल पढ़ कर निकल रही है उसे कश्मीरी भाषा में अवसर न के बराबर मिल रहा है ऐसे में युवा अन्य भाषा को चुनता है चाहे वो अंग्रेजी हो, उर्दू हो या हिंदी, जिससे कि उसे रोजगार के अवसर मिल सकें. अगर जम्मू-कश्मीर सरकार कश्मीर भाषा में रोज़गार के नए अवसर पैदा करती है तो इन्हें उम्मीद है कि आज के युवा इससे जरूर जुड़ेंगे. उन्होंने कहा कि वर्तमान में हो रही कश्मीरी पत्रकारिता इसके लिए एक नए रास्ते हमवार कर सकती है. जबकि जम्मू-कश्मीर से यू.एन.आई की उर्दू सेवा देख रहे ज़हूर भट्ट कहते हैं वर्तमान सदी में जो भाषा इंटरनेट की भाषा बन गयी वो कभी मर नहीं सकती. उन्होंने ख़ुशी ज़ाहिर करते हुए कहा कि कश्मीरी पत्रकारिता को इतना नज़रअंदाज़ करने के बावजूद आज यह इंटरनेट की भाषा बड़ी तेज़ी से बन रही है. अभी इंटरनेट पर कई कश्मीरी भाषा में पत्र-पत्रिकाएं मिल जायेंगीं, जिससे कि कश्मीरी पत्रकारिता का एक नया सूत्रपात होने जा रहा है.

संदर्भ:
1.      Natarajan, J. (2000). History of Indian Journalism. New Delhi: Publication Division
2.      Rai, Mridu. (2004). Hindu Rulers, Muslim Subjects. London: Permanent Black
3.       चंदन, गुरबचन. (2007). उर्दू सहाफत का सफर. दिल्ली: एजुकेशनल पब्लिशिंग हाउस
4.      About Sangarmal Kashmiri Daily Newspaper
5.      Newspapers in Kashmiri language
6.      First Kashmiri language daily launched in J-K

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